American horror story // एक कब्र की कहानी 

Let`s read an American horror story based on an Indian muslim family who lives in America.

एक कब्र की कहानी 

12 जून 1995 का दिन था। हम रात के खाने पर बैठे ही थे कि अचानक हमारे फ़ोन की घन्टी बजी। उस वक्त फोन उठाना सबके लिए मुसीबत लगा। मैंने हाथ खींच लिया और दूसरों को तकलीफ से बचाने के लिए फोन उठाने तेजी से दूसरे कमरे में भागी। फोन उठाया तो दूसरी तरफ से मेरी  बड़ी  बहन के देवर ने इत्तिला दी कि उनके वालिद का इन्तिकाल हो गया है। उन्होंने  से फोन किया था। मेरी बहन भी दूसरे शहर वॉशिंगटन में रहती थीं लेकिन मौजूदा हालात की वजह से वह अपने शौहर के साथ हमारे घर शिफ्ट हो गई थीं। उनके ससुराल वाले  वॉशिंगटन चले गए थे। फोन पर यह खबर मिलते ही हमने अपने तौरपर उनके तमाम रिश्तेदारों को खबर करवा दी। यहां पर मेरे बहनोई समीत उनके दोनों भाइयों को खबर कर दी थी। मेरे बहनोई और उनके भाई शरीफ़ अपने एक बेटे समेत हमारे घर आ गए। अपने घर से मैं और मेरा भाई तारिक जाने के लिए तैयार हो गए। आखिर यह काफ़िला रात ग्यारह बजे रवाना हो गया। बड़ी मुश्किल से सफर की परीशानियां झेल कर पहुंचे । हमारे इन्तिज़ार में जनाज़ा तैयार था आखिरी दीदार के लिए सब ही लगभग रो रहे थे । अठाईस घन्टे गुज़र जाने के बाद भी मुर्दा ऐसा ताजा था जैसे अभी दम दिया हो ।

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दफ्न के बाद कुछ अजीब वाकेआत सामने आए। उस घर में जितने जानवर थे एक एक करके मरना  शुरू हो गए।  यहां यह बताती चलूं कि आपी के ससुराल वालों को इस घर में शिफ्ट हुए सात दिन हुए थे। दफ्न के बाद बकरियां मरनी शुरू हो गयीं फिर परिन्दे मरने लगे। रात को अचानक आपी की सास के हाथ में सांप ने  डस लिया जिससे पूरे हाथ में जहर फैल गया। ज़हर जोंक लगवा कर निकाल दिया गया। तीजे वाले दिन मेरी आपी के अचानक दिमाग में तेज़ दर्द उठा । मैंने इसे मामूली दर्द समझा । मैं उनके खेतों में घूमने निकल गई जहां आमों के अनगिनत पेड़ थे। दोपहर के वक्त जब मैं वापस आई तो अपनी बहन को उसी हालत में तड़पते पाया। मैं उनका सर दबाने लगी। दबाते दबाते अचानक मेरे पेट में दर्द होनेलगा। रात होते होते मेरा पेट पत्थर की तरह सख्त हो गया। उसके बाद उल्टियां शुरू हो गयीं। मेरी बहन अपना सर का दर्द भूलकर मेरी तीमारदारी में लग गयीं । रात होते होते मुझे ऐसा महसूस होने लगा जैसे कोई मेरी आतें काट रहा हो। रात में मेरी बहन मेरे सरहाने बैठी रो रही थी कि अचानक बहुत सारे कबूतर पेड़  के ऊपर आकर बैठ गए जबकि पंखा अपनी पूरीरफ्तार से चल रहा था और वह पंवड़ियों पर बैठे रहे। हम दोनों यह मन्जर अपनी खुली आंखों से देख रहे थे वाकी घर वाले सो रहे थे। आपी डर गयीं, कहने लगी- “मैं तुम्हारे पैरों में तेल लगाएं, शायद आराम मिल जाए।” अचानक मेरी नजर उठी तोदेखा कि आपी के ससुर साहब दरवाजे के बीच खड़े आपी को इशारा कर रहे हैं और आपी उठी तो खिंचती हुई मेगनेट की तरह उनकी तरफ चल दी और जिस जगह आपी के ससुर का इन्तिकाल हुआ था वहां जाकर रुक गयीं। अचानक उन्हें झटके से महसूस हुए और वह होश में आगयीं और वहां से वापस दौड़ीं। डर और खौफ से हम दोनों का बुरा हाल हो गया था। नीन्द कोसों दूर थी। ऐसा महसूस होता था कि कोई हमारी चारपाई के नजदीक खड़ा है लेकिन हम दोनों की आंखें डर के मारे बन्द
हो गयीं। _मेरे पेट का दर्द बढ़ता जा रहा था। आखिर सुबह हुई तो डाक्टर के पास गए लेकिन तकलीफ में कमी नहीं हुई। आपी ने मुझे मशवरा दिया कि मैं वापस वाशिंगटन  चली जाऊं मगर मैं ऐसी तकलीफ़ की हालत में सफर करने के लिए राजी नहीं थी।


दोपहर तक मेहमान औरतों में से एक औरत की अचानक हालत बिगड़ी। ऐसा महसूस होता था कि जैसे अभी उसकी जान ही निकल जाएगी। थोड़ी देर बाद मेरे भाई तारिक के सर में जबरदस्त दर्द होने लगा। यह देखकर मेरा भी दिल घबराने लगा क्योंकि मालूम हुआ कि यह घर काफी दिनों से बन्द पड़ा था और इस घर से थोड़े फासले पर कब्रस्तान है । घर के पिछले हिस्से की तरफ कोई आबादी नहीं थी बल्कि वहां से कब्रस्तान की हदें शुरू हो जाती थीं।

इन्हीं परीशानियों में रात हो गई। पेट में तकलीफ़ और बढ़नी शुरू हो गई। रात एक बजे आंख लगी तो मुझे ख्वाब आया जैसे कोई सफ़ेद पोश मेरे सरहाने खड़ा है। उसने हमें इस घर से चले जाने का हुक्म दिया और कहा- “तुम लोग चले जाओ। तुम्हारा नुकसान पूरा कर दिया जाएगा।” यह ख्वाब सिर्फ मुझे ही नहीं मेरे भाई को भी आया था।


_उस ख्वाब ने सब घर वालों को परीशान कर दिया और हम फ़ौरी तौर पर बम्बई वापस आने के लिए तैयार हो गए। मुझे उलटियां हो रही थीं। एक आदमी ने अल्लाह का कलाम पढ़ा हुआ पानी पिलाया तो कुछ आराम मिला । ऐसी हालत में हम वापस वाशिगटन  के लिए रवाना हो गए।
जब हम घर पहुंचे तो घर वाले हमारी हालतें देखकर परीशान हो गए। उन कुछ ही दिनों में हमारे हुलिये बिगड़ गए थे । उन हालात की वजह से हम सभी पर अजीब घबराहट तारी थी। घर पहुंचने पर ऐसा लग रहा था कि हम किसी आफ़त से बच गए हैं और यही हुआ भी। मेरी तबीअत आपही आपऐसी हो गई जैसे मुझे कुछ हुआ ही नहीं था। तारिक भाई का दर्द भी खुद ब खुद जाता रहा। आपी भी तरोताज़ा हो गयीं।
अगली सुबह चाय पीते हुए हमने अपना प्राइज़ बान्ड का नम्बर चैक किया तो हमारा पांच हज़ार वाला बान्ड इनआम में निकल आया था और मुझे अपना ख्वाब याद आ गया कि तुम्हारा नुकसान पूरा हो जाएगा, यहां से फौरन चले जाओ। बाजी के ससुराल वालों ने भी चालीसवें से पहले ही उस घर को छोड़कर दूसरा घर ले लिया था। इस वाक्य  को मेरे लिए ही नहीं मेरे घर वालों के लिए भी भुलाना मुमकिन नहीं।

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