Children stories hindi | Stories in hindi for children | Stories in hindi

प्यारे बच्चो- आज हम आपके लिए children stories hindi ले कर आये है जो आपको बेहद पसंद आएगी , दरअसल ये कहानी राजा कुमारजीव की है जिन्हे चीन के सम्राट ने राष्ट्र गुरु ( कुओ – शिह ) की उपाधि देकर सम्मानित किया था | 

राजा कुमारजीव 

डेढ़ हजार साल पहले-चंद्रगुप्त विक्रमादित्य भारत के राजा थे । तभी प्रसिद्ध चीनी यात्री फाहियान यहाँ आया। कितने ही बौद्ध ग्रंथ यहाँ से ले गया। उन्हीं दिनों चीनी सम्राट के निमंत्रण पर एक भारतीय चीन की राजधानी पहुँचा था। चांगान पहुँचने पर उसका धूमधाम से राजकीय ढंग से स्वागत किया गया । चीन के सम्राट ने उसे राष्ट्र गुरु (कुओ-शिह) की उपाधि देकर सम्मानित किया । उस महापुरुष का नाम था कुमारजीव।

 

कुमारजीव की कथा अनोखी है। उनके पिता कुमारायण एक भारतीय रियासत में थे । मंत्री बनने का अवसर आया, तो वह बौद्ध भिक्षु बन गए । यात्रा पर निकल पड़े । घूमते-घूमते मध्य एशिया के कूचा शहर में जा पहुँचे। वहाँ के राजा ने कुमारायण का स्वागत किया । उन्हें राजगुरु बना लिया । राजा की बहन जीवा के साथ उनका विवाह हो गया । पहले पुत्र का नाम ही ‘कुमारजीव’ हुआ।

 

कुमारजीव बचपन से ही बड़े होनहार थे । माँ ने उन्हें धर्म-ग्रंथों का पाठ करना सिखाया। फिर माँ  अपने बेटे को कश्मीर लेकर आई। वहाँ उसने
आचार्य बंधुदत्त से शिक्षा ली। खासकर बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन किया । कश्मीर से लौटते हुए कुमारजीव कई नगरों में गए। उन्होंने वेदों और भारतीय दर्शन के बारे में अपना ज्ञान बढ़ाया।बीस वर्ष के कुमारजीव कूचा वापस पहुँचे। वहाँ राजमहल में उन्होंने दीक्षा ली । भिक्षु बन गए ।

 

अगले बीस बरस वह वहीं रहे । उन दिनों कूचा में मंदिर और मठ दस हजार थे । सबसे बड़े मठ में कुमारजीव धर्म का उपदेश दिया करते । सैंकड़ों मील दूर से भी लोग वहाँ आया करते । कूचा नगर उन दिनों भारतीय संस्कृति और बौद्ध धर्म के प्रचार का बड़ा केंद्र था । दूर-दूर तक कुमारजीव की कीर्ति फैल गई।चीन भी अछूता नहीं रहा । वहाँ के राजा फूचियेन उन्हें अपने यहाँ बुलाना चाहा । पर वह सफल नहीं हुआ।

 

फूचियेन ने अपने सेनापति को भेजा।कूचा जीतने के बाद कुमारजीव को बंदी बना लिया गया। लियांग चाऊ ने कुमारजीव को सत्रह बरस तक नजरबंद रखा । यह नजरबंदी कुमारजीव के लिए वरदान बन गई । इस समय उन्होंने चीनी भाषा का जमकर अध्ययन किया । बाद में संस्कृत ग्रंथों का चीनी में अनुवाद करते हुए यह पढ़ाई उनके बहुत काम आई।

 

चीन में शासन बदला। चीन के नए सम्राट याओह सिंग ने कुमारजीव की नजरबंदी खत्म करने के लिए सेना भेजी । कुमारजीव के आने पर राजधानी में रोशनी की गई। सम्राट ने अपने राजसी उद्यान में उन्हें रहने को कहा । आठ सौ विद्वान भिक्ष कुमारजीव को सौंप गए । कुमारजीव धर्म ग्रंथों का अनुवाद करने लगे।उन्होंने सहज-सरल भाषा में तीन सौ ग्रंथों का अनुवाद किया । कई ग्रंथ स्वयं भी लिखे । आज भी उनके ग्रंथ
शुद्ध और प्रामाणिक माने जाते हैं। सम्राट की इस काम में विशेष रुचि थी। कई बार वह स्वयं पोथी हाथ में लेकर कुमारजीव के चरणों में बैठता ।

 

रोज भिक्षु संघ की बैठक जुड़ती। उसमें कुमारजीव मूल पाठ करते। फिर चीनी अनुवाद करते । अनेक विद्वान अपनी-अपनी राय देते । कई
बार एक ही वाक्य का अनुवाद करने में घंटों बीत जाते।_चीन के कोने-कोने से विद्वान और युवक कुमारजीव के पास आते । वे उनके शिष्य बन कर धन्य हो जाते । तीन हजार से अधिक उनके शिष्य थे । परिश्रम, प्रतिभा और ज्ञान का जो ध्वज कुमारजीव ने फहराया, वह आज भी लहरा रहा है । भारत ने कभी किसी पर हमला नहीं किया । हमेशा सुख-शांति और ज्ञान का संदेश फैलाया। 

प्यारे बच्चो, आप सभी को children stories hindi कैसी लगी हमे जरूर बताइयेगा ,ताकि हम आपके लिए इसी तरह की children stories hindi  ले कर आ सके – धन्यवाद 

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