Hindi Story for Childrens | Story in Hindi | हिन्दी कहानी

प्यारे बच्चो , आज मैं आपके लिए Hindi Story for Childrens लेकर आया हूँ , दरअस्ल ये Hindi Story for Childrens एक अघोरी बाबा की कहानी है। मैं आशा करता हूँ की आपको ये कहानी पसंद आएगी। 

Let`s start Reading Hindi Story for Childrens

माफ़ कर दो बाबा 

मुहल्ले के बच्चों को यह बात बुरी लगती थी कि आखिर वह बाबा कुछ काम-धाम नहीं करता और बैठा खाता है। उनकी समझ में यह नहीं आता था कि उनकी (माँओं की) बाबा के प्रति इतनी हमदर्दी क्यों है? कभी गिट्ट के, कभी नीलू के, गरज यह कि मुहल्ले के सभी  घरों से, बारी-बारी से बाबा के लिये खाना भेज दिया जाता।

खाना भी कैसा-बचा खुचा या बासी थोड़े न! लोग जो खुद खाते, वही बाबा को भी खिलाते। सवेरे की रोटियाँ बची हैं, तो बच्चे खा लेंगे। बाबा को तो ताजी रोटियाँ ही भेजी जायेंगी। किसी के घर में खीर-कढ़ी बनी हो, तो भले ही घर के लोगों को भरपेट न मिले, लेकिन बाबा के लिए जरूर जानी हैं।

यह सब उन्हें बेहद अखरता। “इससे तो अच्छा, किसी कुत्ते को खिला दो। कम से कम चौकीदारी तो किया करेगा। या बाबा-लूला-लंगड़ा होता तो बात और थी। भिखमंगा भी तो नहीं है। भिखारी ऐसे पक्के मकान में रहते हैं भला? कामचोर है।” गिट्ट ने मुँह बिचकाया। “जानते हो, एक दिन सात रसगुल्ले लाये थे पापा।hindi story for childrens

पाँच घर के पाँच जनों के वास्ते और दो उस मक्कार बाबा के लिए। यह भी कोई बात हुई?” मानू की आँखों में झलक आयी घृणा कोई भी देख सकता था। नंदन ने मायूस सी सूरत बनायी और बोला, “मैंने पूछा था एक दिन मम्मी से। वो तमाचा पड़ा कि निशान कयामत के दिन तक रहेंगे। मेरा तो दिमाग ही काम नहीं करता। इनकी बुद्धि पर । पत्थर क्यों पड़ गये हैं भला?” |

अंत में सब बच्चों ने फैसला किया कि बाबा के लिए भेजा जानेवाला खाना अब से कुत्तों के नसीब में लिखा जायेगा। बाबा  जाये भाड़ में। खाना मुफ्त का नहीं आता। पापा दिन भर दफ्तर में हड्डियाँ तुड़वाते हैं, तब मिलती हैं रोटियाँ। बैठे-ठाले वाली बात नहीं चलेगी। पसीना बहाओ, तब खाओ, यहाँ इतने फ़ालतू  – नहीं हैं पैसे। अरे भई, बैल भी गाड़ियाँ खींचते हैं, तब मिलता है चारा। अब वो ज़माना गया। नया खून इतना मूर्ख नहीं है।


– पहले दिन, बारी आयी नंदू की। उसने बाबा को भेजा जानेवाला सारा खाना काले पिल्ले के सामने उलट दिया, “ले तू भी क्या याद करेगा।” पर पकड़े गये नंदू महाशय। फिर वो पिटाई हुई कि नीले निशान कोई भी देख सकता था। रात को रिसे आटा गूंधकर रोटियाँ बनायीं माँ ने। सब्जी बची थी नहीं और बनने में देर लगती, तो नंदू मियाँ के हिस्से का दध बाबा को पहँचा दिया गया। बेचारा नंदू हैरत से देखता रहा, मन-ही- मन कढ़ता रहा, पर हिम्मत नहीं हुई कुछ कहने की। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह सब माँ को पता चला कैसे? शायद सामने वाली रहमत आँटी ने चोरी पकड़ ली थी।


उन्होंने ही चुगलखोरी की होगी। इस घटना से और घाटा ही हुआ। अब बाबा को खाना उनके मम्मी पापा ही पहुँचाने लगे, ताकि गड़बड़ की कहीं कोई गुंजाइश ही न रहे। इक्का-दुक्का यदि किसी को खाना पहुँचाने को दिया भी जाता, तो मय हिदायत के ख़बरदार जो गड़बड़ की। वैसे भी अब उनकी हिम्मत नहीं पड़ती थी। नंदू की पिटाई की कल्पना करते ही सबकी हड्डियाँ काँप जाती। उस दिन बच्चे स्कूल से लौटने पर हक्के-बक्के रह गये।

बाबा के घर के सामने पूरा मुहल्ला जमा था। सब सिसक रहे थे। कभी पर्दे से बाहर न आने वाली शाहनवाज़ आँटी बिलख रही थीं और तो और नरेश अंकल तो फौज में मेजर थे, फिर भी सिसक रहे थे। उन्हें समझते देर न लगी कि बाबा का स्वर्गवास हो गया है। जीते-जी किसी के प्रति आदमी के मन में कितनी भी नफरत हो, उसके मरने के बाद वह सब मिट जाता है।

बच्चों के मन में भी एक सहानुभूति सी उभर आयी। फिर भी उन्हें संतोष था, चलो गया तो सही बाबा।।।  पर हैरत तो उन्हें तब हुई जब अपने-अपने घरों में पहुँचने पर उन्हें चूल्हे औंधे हुए मिले। खाना किसी के घर नहीं बना था। नंदू से अब रहा न गया। वह लपककर पापा के पास पहुँच गया। गुस्से से उसकी सूरत लाल थीं, “पापा।” पापा ने डबडबायी सूनी नज़रें ऊपर उठायीं। “पापा आज खाना क्यों नहीं बना है?”

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पापा चुपचाप उसे घूरते रहे। कोई जवाब नहीं दिया। नंदू और चिढ़ गया, बोला, “पापा, यह सही है कि बाबा मर
गया। पर आप यह मातमी सूरत बनाये क्यों बैठे हैं? मर गया भला हुआ। बैठकर खाता था। अब आप…” “क्या ! क्या कहा, फिर कहना ज़रा।” पापा गरज उठे। सहमा नंदू जब तक कुछ समझता, उसकी शामत आ गयी।
मालूम नहीं, पापा को क्या हो गया था। वो नंदू के बाल पकड़कर उसे पीटते जा रहे थे। लात-घूसे खाकर नंदू कुप्पा हो गया, पर फिर भी पापा ने उसे नहीं छोड़ा। लात-घूसों के बाद पापा ने चप्पल उठा ली, फिर छड़ी। बेचारा नंदू चीखता जा रहा था।

___”हाँ-हाँ, क्या जानता है तू उनके बारे में? बताना जरा। नालायक, मेरा बेटा होकर ऐसी बातें करता है! शर्म नहीं आती?” पापा हाँफने लगे, “आइंदा तुम्हारी जुबान से ऐसी बातें सुनीं, तो मैं तुम्हारे जनाज़े को कंधा देना पसंद करूँगा, तुम्हें अपने घर में देखना नहीं।” हाँफते हुए पापा बैठ गये। बड़बड़ाते रहे, “तू इस घर में पैदा क्यों हुआ नंदू ! काश, तू मेरा बेटा न होता!” राजू, मानू, नंदन सब भौंचक्के खड़े थे। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था।

क्या हो गया, नंदू के पापा को? ___ पापा ने काँपती-थरथराती आवाज़ में उनसे पूछा, “मानू, राजू बेटे जानते हो बाबा कौन थे? नंदू जानते हो नंदन…?”

और फिर पापा ने वह कहानी सुनायी जिसे सुनकर राजू, नंदू, मान, नंदन सबके कलेजे मुंह को आ गये। अपने आपसे घृणा हो चली उन्हें, आँखों में आँस छलक उठे। सच, कितने महान थे बाबा। सन् 62 से पहले, जहाँ आज साहू चीनी मिल है और उसके पीछे की जमीन सारी बाबा की थी।

आज जहाँ न्यू सिविल लाइंस है, वो ज़मीन भी बाबा की थी। कई और भी जगहों पर बाबा की काफी जमीन-जायदाद थी। हीरालाल बिल्डिंग जो शहर की सबसे आलीशान इमारत है, वह बाबा की थी। लाखों का कारोबार था उनका। बाबा के तीन जवान, हट्टे-कट्टे बेटे थे। बड़ा बेटा B.A करने के बाद सेना में भरती हो गया। हुआ क्या बाबा ने कर दिया।


फिर आया सन् 62, चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया। गरीब, अमीर, सब जिससे, जितना बन पड़ा देश की रक्षा के लिए दान देने लगे। बाबा ने अपनी सारी जमीन, वो बिल्डिंग, सारी जायदाद, अपना सब कुछ देश के नाम कर दिया। उन दिनों सेना में धड़ाधड़ भरती हो रही थी। बाबा ने अपने शेष दोनों बेटों को भी देश की रक्षा के लिए सेना में भेज दिया।


एक दिन समाचार आया कि बाबा का बड़ा बेटा नेफा के मोर्चे पर शहीद हो गया। बाबा दो क्षण को सन्न से जरूर रह गये, पर उनके चेहरे पर दुख की कोई लकीर न थी। काँपती  आवाज़ में उन्होंने इतना ही कहा, “दो अभी बाकी हैं।” फिर एक-एक करके उनके दोनों बेटे भी शहीद हो गये। किसी को पागल कर देने के लिए इतना काफी था, पर अपनी सारी संपत्ति और तीनों बेटों को खोकर भी बाबा जिंदा रहे।

रोते-फफकते उन्होंने यही कहा, “काश! मुझे दो बेटे और भगवान ने दिये होते!” उसके बहुत पहले बाबा स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा ले चके थे। दसियों बार जेल गये थे, लाठियाँ खायी थीं। किसी चीज़ की कमी न थी उन्हें! लाखों का व्यवसाय था, तीन बेटे थे, पर उन्होंने देश के लिए अपना सब कुछ उत्सर्ग कर दिया।

___“काश तुम मेरे बेटे न होते नंदू।” पापा ने रुंधे कंठ से कहा और उठकर चले गये। आज, जहाँ बाबा की चिता जलायी गयी, उस जगह को एक समाधि या कहें स्मारक का रूप दे दिया गया है। मुहल्ले के बच्चे आज भी रोज़ वहाँ जाते हैं। फूल चढ़ाते हैं। घुटने टेकते हैं और दोहराते हैं, “बाबा हमें माफ कर दो। सच बाबा कितने महान थे। कितने ऊँचे थे। पर बाबा विश्वास रखो, जब कभी देश को जरूरत होगी, तुम्हारे बच्चे जिंदा हो जायेंगे राजू, नंदन, मानू, नंदू के रूप में। हमें माफ कर देना बाबा…।” वापसी में उनके कदम बोझिल होते हैं और आँखें भरी-भरी सी।

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