Romantic story hindi // मुहब्बत के ख़्वाब

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मुहब्बत के ख़्वाब 

” हम लड़कियाँ इतनी खुश फहम क्यों होती हैं ?” यह मेरा खूद से शिकवा था। जिसे मैं ने अपने दिल की सीलन भरी दीवारो से बाहर निकाला।
“इसलिए कि लड़कियाँ जो हुयीं।” एक कहकहा उबल पड़ा और मैं उदास हो गई। मैंने अपने सामने बैठी चारों लड़कियों को देखा था।

_ ‘रूबी! तुम सब कुछ भूल क्यों नहीं जातीं।” मेरे कान्धे पर एक हमदर्द के हाथ का वजन पड़ा था, वह मेरे सामने ही टिक गई। “क्या कुछ भूल जाना आसान है ?” मैं ने शिकवे भरी नज़रों से उसे देखा। “हां, अगर बन्दा खुद चाहे तो मुमकिन है लेकिन शायद तुम खुद ही भूलना नहीं चाहती।” वह मेरे बर्फ हाथों को अपने गर्म हाथों में लेकर खुलूस से बोली। एक यही अकेली कज़िन थी जो कुछ भी कह सकती थी और उसी को कहने का हक था। उसकी किसी बात का मैं ने बुरा नहीं माना था।

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___“घर में कोई बात हुई है क्या? या  अम्मां ने कुछ कहा तुम से? जरूर कोई गर्मा गर्मी हुई होगी।” वह कुछ देर खामोश रही और फिर मेरे चेहरे पर नज़रें जमा कर बोली और मेरे चेहरे को तके जा रही थी। मैं फिर भी खामोश रही। “बताती क्यों नहीं?” उसने मुझे खामोश देख कर पूछा था।

__“वही अम्मी की एक ही जिद….अब शादी कर लो, बहुत वक्त गुजार लिया आजादी में अब जीवन साथी के बगैर कब तक जिओगी, भाभी का अलग दबाव कि अच्छे रिश्ते आ रहे हैं। अब भी इनकार करोगी तो इनकार करती रह जाओगी।” मेरे लहजे में दुख ही दुख था।
“तो कर लो शादी कब तक तन्हा रहोगी। किसके कहे पर इतना वक्त बर्बाद कर रही हो। भूल जाओ उसे और फिर से नई ज़िन्दगी की शुरूआत करो।” किरन ने किस आसानी से कह दिया था।

___ “तुम्हें क्या मालूम किरन, मैं कैसे यह सब कर लूं। दिल में कोई और जिन्दगी में कोई और साथी हो, यह जुल्म होगा मुझ पर भी और उस पर भी जो मेरी जिन्दगी में सिर्फ मेरा बन कर आएगा।” मैं जब्त करते करते थक गई थी किरन के शाने पर सर रख कर धीरे से रो दी । वह मेरा शाना (कन्धा) थपकाने लगी। “जुल्म तो तुम कर रही हो खुद पर।

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हरजाई को जहन की सलेट पर बनाकर खुद को ज़िनदगी की खुशियों से दूर कर रही। आखिर क्यों ?” किरन मुझे समझाने लगी। मैं चुपचाप आंसू बहा रही थी। पिछले दो दिन से सबीहा आपी की ननद की शादी के सिलसिले में मैं उन की ससुराल रूकी हुई थी। किरन भी अपने ससुराल से आई हुई थी। रात ही नाज़िया अपने जीवन साथी शारिक के साथ रूखसत हो गई थी। बोर हो रही थी बाहर लान में आ बैठी। मेरे
पीछे ही लड़कियाँ और किरन भी आ गई थी। आज इरादा वापस जाने का था। “मिस रूबी आलम आपने मेरी बातों पर गौर किया।

” मैं कमप्यूटर पे काम कर रही थी जब सर हारिस अलवी ने टेबल पर दस्तक देने के अन्दाज में उंगली मारते हुए चौंकाया। मैं ने सर उठा कर उन्हें देखा वह हमेशा की तरह खुश खुश थे। “सर प्लीज! आप मेरा ख्याल दिल से निकाल दें। मैं…मैं आप की बहुत रेसपेक्ट करती हूं। मैं कान्टा हूं गुलाब नहीं। एक हसीन ख्याल हूं, एक खूबसूरत हकीक़त नहीं।” मैं ने चिड़ कर हमेशा की कही हुई बात फिर दोहरा दी। “मैं इस हाल में भी ज़िन्दगी गुजार दूंगा, बस आप मेरा साथ तो दें।” वह अपने इरादे पर अटल थे। मुझे खौफ था कि उनकी यह मुस्तकिल मिजाजी मुझे हिलाकर न रख दे। मैंने अपना ध्यान कमप्यूटर पर लगाया। मैं उनको इग्नोर किए अपने काम में मसरूफ़ थी। “मिस रूबी आलम प्लीज! उन्होंने माऊस मेरे हाथों से लेकर कमप्यूटर आफ कर दिया। मैं हैरत से उन्हें देखने लगी। “मेरी साथ आपको कभी खुशी नहीं दे सकता।” मैं ने होन्ट काटते हुए कहा। “यह मेरी प्राब्लम है। मैं हर तरह के हालात का सामना करने के लिए तय्यार हूं।” हारिस बड़े ठहरे हुए लहजे में बोले
थे। उनकी ब्राउन नशीली आंखें मेरे चेहरे पर जमी हुई थीं। “लेकिन सर मैं अब भी यही कहूंगी कि मेरे दिल के वह किवाड बन्द हो गए हैं जो
कभी लफ़जे मुहब्बत पे खुलते थे।” मैं ने निगाहें झुका लीं। वह कुछ देर मुझे देखते रहे और फिर लम्बे लम्बे कदम  भरते चले गए।
***
“रूबी क्यों मुझे मेरे फर्ज से पार होने नहीं देती।” “तेरा बोझ लेकर मैं कब्र में उतर जाऊंगी तो मेरी रूह तड़पती रहेगी। आखिर क्यों मेरी बात नहीं मानती, तैमूर बहुत अच्छा लड़का है। अपना देखा भाला है। बहुत ख्याल रखेगा तुम्हारा।” उस रोज अम्मां को फिर मेरी शादी करने का दौरा पड़ा था।

– ज़रूर आज तैमूर की मां और बहन आ धमकी होंगी। “अम्मा! प्लीज…..मैं ने कहा नांकि मैं शादी के लिए जहनी तौर पर तय्यार नहीं हूं। जब दिल व दिमागआपस में दोस्ती कर लेंगे, तब मैं आपको पाजिटिव जवाब दे दूंगी।” मैं ने अम्मां से आहिस्तगी से कहते हुए अपना चेहरा घुटने पर रख दिया। अम्मा बड़बड़ाती अन्दर चली गयीं। अम्मां के जाने के बाद मैं फिर माजी (पास्ट) में खो गई।
“एकसक्यूज़मी मिस…! “मैं लायब्रेरी से निकली ही थी जब किसी ने पीछे से मुझे पुकारा । मैं मुड कर देखने लगी वह जो कोई भी था तेजी से मेरी तरफ़ आ रहा था। “आप अपनी किताबें लायब्रेरी में ही टेबल पर छोड़ आयीं।” उसने किताबें मेरी तरफ़ बढ़ाते हुए कहा तो मैं ने शुक्रिया अदा करके अपनी किताबें ले लीं। “हैलो मिस! आप वही है नां।” वह अपने जहन पर जोर देते हुए बोला । मैं और किरन आर्टस फैकल्टी  में दाखिल हो रही थीं कि रूक गयीं। “जी बिल्कुल!” मैं मुस्कुराते हुए बोली, किरन उसे तक रही थी।

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“आप का नाम।” “मैं रूबी आलम और यह मेरी कज़िन और दोस्त किरन अनवार।” मैं ने बताय किरन अब हम दोनों से लातअल्लुक दूर कहीं देख रही थी। “अगर आप मेरे साथ एक कप चाय पीलेंगी तो मुझे खुशी होगी।” उसने आफ़र दी तो मैं उलझ कर रह गई। एक अजनबी से इतनी बेतकल्लफी मुझे खुद अच्छी नहीं लग रही थी। “सोरी! मैं तो चाय नहीं पीती।” किरन कहती कलास लेने चली गई। उसके इस तरह छोड़ कर चले जाने पर मुझे गुस्सा तो बहुत आया।  “कैसी दोस्त है आपकी? आपको तन्हा छोड़ गई।” मौका गनीमत जान कर उसने वार किया और मैं किरन से नाराज उसके साथ चली गई। इस मुलाकात के बाद हमारी अच्छी खासी दोस्ती हो गई थी। उसका नाम वलीद था। बहुत स्मार्ट और अच्छी बातें करने वाला लड़का था। उसकी बातें सुनते रहने को जी चाहता था। “पता है रूबी! तुम से मिलकर मुझे यूं लगा जैसे मैं तुम्हें बरसों से जानता हूं।” कैफे में हम दोनों के सिवा और कोई न था। उसकी बात के जवाब में मैं खामोश रही थी। “रूबी…। यह किरन हर वक्त क्यों तुम्हारे साथ चिपकी रहती है।” पल में वलीद ने मुंह फुला लिया। मैं बेसारता मुसकरा दी। “अरे भई! वह मेरी कजिन है, सहेली भी है। हम एक साथ ही कालेज,और घर आते जाते हैं। और हम दोनों एक ही कलास में भी तो हैं।” मैं ने बताया और उसे देखने लगी वह खफा लग रहा था।
“बस मुझे अच्छा नहीं लगता मेरे अलावा तुम्हारे साथ कोई और हो।” यह एक आम सी बात थी जो वलीद ने कही थी लेकिन इस एक आम सी बात ने मेरे अन्दर फूल खिला दिए थे। मैं हैरानगी से उसे देख रही थी और वह अपनी घड़ी से खेल रहा था। उस रोजतोहद ही होगई जब फाइनल के अली के साथ मिल कर मैं ने थीसेज मुकम्मल किया था। हम पूरा दिन एक साथ रहे थे। आज किरन भी तबीअत खराब होने की वतह से यूनीर्वसिटी न आसकी थी। में बस पकड़ने के लिए तेजी से चली जा रही थी कि बीच रस्ते में वलीद आगया। उसका चेहरा लाल भभूका हो रहा था और आंखों से शोले लपक रहे थे मैं वाकई सहम गई।

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“यह तुम अली के साथ क्या कर रही थीं?” उसने आते ही पूछा । मैं हैरत से डूबी उसे देखने गी। उसका यह अन्दाज मुझे जरा पसन्द नहीं आया था। “तुम कल किरन का इन्तिजार करके भी काम कर सकती थीं।” उसने गुस्से से कहा तो मुझे भी गुस्सा आ गया। “वलीद यह मेरे काम हैं, मुझे ही करने हैं आज या कल, तुम्हें मेरे कामों में दख्ल अन्दाजी करने का कोई हक नहीं।” मेरा लहजा अजनबी हो गया था। “सोरी! लेकिन कल से तुम अली के साथ नहीं होगी। “मुझे यह अच्छा नहीं लगेगा।’ पल में वह बदल गया था। सोरी की तो.मैं ने भी मुआफ कर दिया।
फिर तो ऐसे होता मुझे जब भी ज़रा सा भी काम पड़ता और अंगूठी के जिन की तरह वलीद हाज़िर होता । मेरे काम आता वह हर काम मे मेरी हैल्प करता रहता। उसकी इन ही छोटी छोटी तबज्जोह देने वाली बातों और खूबसूरत लफजों ने मुझे मुहब्बत के भेद से आगाह कर दिया था। उसके जज्बे लुटाती आंखें शोख बातें मेरे अन्दर फूल खिला देतीं और मैं घन्टों वलीद को सोचे जाती। किरन मेरी इस दीवानगी पर हंसती, उन ही दिनों किरन की मंगनी तारिक से हो गई । मेरे बहुत से प्रपोजल आए मगर मैं ने हर एक को मायूस लौटा दिया। मुझे इन्तिजार था वलीद मुझे
खुद प्रपोज़ करे। “तुम बहुत खूबसूरत हो।” हाल के दिनों में एक और खूबसूरत बात वलीद ने कही थी। मैं दिलकशी से मुस्कुराती अपनी रेशमी लट से उलझने लगी। “मुझे सोचती हो?’ मेरे संग चलते हुए उसने पूछा तो मैं रूक गई।

– “इतना मुश्किल सवाल तो नहीं था।” वह अपनी पैन्ट की जेबों में दोनों हाथ घुसाए मेरी आंखों में झांकने लगा।  “जब तुम मेरे साथ हो तो लगता है सारी दुनिया मेरी मुटठी में है।” एक और दिल में उम्मीद के दिए रौशन करने वाली बात की तो मैं दीवानी होने लगी। यह वही दिन थे जब वलीद का जादू मेरे सर चढ़ कर बोल रहा था। उन ही दिनों फाइनल बालों के पेपर शुरू होते ही एक अच्छी सी पार्टी लेकर फाइनल वाले रूखसत हो गए उनमें वलीद भी था। उसके जाने से मेरा दिल उदास हो गया था । वलीद कभी यूनीर्वसिटी आ जाता तो मैं गुलबा की तरह खिल उठती। वह दिन बड़ा उदास और अजीब सा था । एक वीरानी सी सारे माहौर पर छाई हुई थी। न जाने क्यों दिल घबरा रहा था । बेचैनी बेकरारी बहुत परीशान किए देर रही थी। मैं लायब्रेरी में तन्हा मौजूद थी। उस दिन भी किरन अनवार यूनीर्वसिटी नहीं आई थी। “हैलो कैसी हो।’ जिन्दगी से भरपूर वलीद की आवाज पर मैं चौंकी और मुस्कुरा दी।

“तुम्हारे साथ होती हूं अगर जब कोई दूसरा नहीं होता।” मैं ने उलटी सीधी हाँ  की तो वह खुल कर हंसा और मेरे सामने वाली कुर्सी पर टिकते हुए मेरे आगे एक शादी का कार्ड रख दिया। मेरी शादी का कार्ड है और तुम्हें आना है किरन के साथ, आखिर मेरी स्पेशल फ्रेन्ड हो।” इधर यह अल्फाज उसके मुंह से निकल रहे थे इधर तीर मेरे दिल में उतर रहे थे काश मेरे कानों में सीसा उन्डेल दिया जाता और मैं यह सब सुनने से पहले ही बहरी हो जाती। मैं ने उसे देखा जो मुतमईन  बैठा  था। “सिर्फ फ्रेन्ड….और कुछ नहीं।” मैं तो जैसे सकते में आगई थी। “हां भई! तुम सिर्फ मेरी दोस्त हो और वह भी सब से अच्छी दोस्त।” वह कन्धे उचकाता हाथ फैला कर बोला। उसका चेहरा दमक रहा था जो मेरी रूह तक को मायूस कर रहा था। उसकी मुस्कुराहट मेरे दिल को चीर रही थी। मेरी आंखों से बेताब पानी बहने लगा। मैंने झट निगाहें झुकाली। “ओह…” उसने अचानक ही चौंकते हुए कहा । जैसे वह सब समझ गया हो । मैं खामोश रही। उसने भी आगे कोई बात न की। फिर कुछ देर चुप रहने के बाद बोला। “अरे भई मेरी तो आदत है इस तरह की बातें करना । मैं अपने फ्रेन्डस पर सिर्फ अपना हक समझता हूं और अपने दोस्तों से यूं ही बात करता हूं। अब तुम खुश फहमी में मुब्तिला हो गई थीं तो इसमें मेरा क्या कसूर? खुदा जानता है मैं ने तो कभी तुम से मुहब्बत का इज़हार नहीं किया। “ वह कितनी बेरहमी, संगदिली से मेरी डेढ़ साला बेतहाशा मुहब्बत को जो मैं ने उससे की, सिर्फ मेरी खुश फ़हमी का नाम देकर अपना दामन साफबचा गया था और मैं साकित सी उसे जाता देखती रह गई। कितने आंसू थे जो मेरी किताबों पर गिरे और बेमोल हो गए।

“हां वाकई! उसने कभी अपने मुंह से मुहब्बत का इज़हार नहीं किसा था लेकिन आंखों की भीतो कुछ ज़बान होती है। शोख जुमलों में भी तो कोई मतलब छुपा होता है। उलटी सीधी तकरार में भी तो कोई हकीकत होती है जो छुपाए न छुप सके मगर फिर भी वह क्यों न समझा मेरे दिल की बात, मेरी आंखों की ज़बान वह क्योंनसमझ सका । या फिर जान बूझ कर….यह भी मुमकिन  है कि मेरा मुहब्बत का इजहार न करना उसे पाबन्द कर गया हो। उसकी हसीन बातों से मैं आप ही आप अपने तौर पर मुहब्बत समझती रही। इन ही बातों को मैं उस के दिल की बात समझती रही मगर अफसोस उसकी वह खूबसूरत दिलकश बातें कोई और नाता न जोड़ सकीं,

सिवाय दोस्ती के, मगर मैं ने तो उससे महब्बत की थी मैं ने तो उसे चाहा था…..वह कितनी आसानी से मेरी चाहत को मेरी खुशफहमी का नाम देकर उम्मीदों को, उसकी यादों में लुटाए हुए बेहिसाब लम्हों को, मेरी ख्वाहिशात को मेरे ख्वाबों को चकना चूर कर गया। वक्त अपनी रफतार से गुजरता रहा। मैं ने मास्टर्स करने के बाद जाब कर ली। किरन की शादी हो गई और मैं एक लम्हे के लिए भी उस जानी दुशमन को भूल न पाई। जब कभी तन्हाई मिलती उस बेवफाकीबातें मेरे कानों में सरगोशियाँ बन कर किसी घन्टी की तरह मुसलसल बजती रहती, किरन ठीक कहती थी, मैं उसे भूलना ही नहीं चाहती, मैं तन्हाई पसन्द होती जा रही हूं।

एक दिन अचानक ही अम्मां को हार्ट अटैक हुआ। भाई ने बड़े धड़ल्ले से इसका जिम्मेदार मुझे करार दिया। भाई जान की तन्जिया नज़रों ने मुझे और हिला दिया। मैं अम्मां के बेड से ही लगी बैठी रहती, भाभी आते जाते कोई न कोई बात करके तन्ज के तीर मेरे दिल पर चलाती रहती थीं। दो चार दिनों में अम्मां की कुछ हालत संभल गई तो मैं ने न जाने किस ख्याल से अम्मी से यह सारी बातें करना चाहीं। मैं ने मुंह खोला ही था कि अम्मी ने मुंह फेरते हुए अपने कान्धे पर रखा मेरा हाथ झटक दिया, यानी अम्मी भी मुझसे नाराज थीं। मेरे दिल पर घूसा सा लगा। यानी वाकई अम्मां को अस्पताल तक पहुंचाने की जिम्मेदार में ही हूं। उस रात मैं सुबह तक रोती रही। फिर मैंने सोचा अपने प्यारों की खातिर उनकी खुशी की खातिर ज़िन्दगी के इस रूटीन को बदलना ही पड़ेगा। अपनों के कल की खातिर अपने कल की खातिर।
***
उस बेवफा वलीद की याद में अपने आपको जलाते रहना अपने साथ जल्म है, ज्यादती है। मेरे अन्दर से उठने वाली इस आवाज ने मुझे झिंझोड़ डाला। क्यों अपने आप पे जुल्म करती हो, मां का जीना हराम करती हो, क्यों अपना फयूचर तबाह करती हो? यह कितने सवालात थे जो मैं अपने आप से कर रही थी।

मैं इस कदर गैर अहम थी कि वलीद ने मुझे फरामोश कर दिया। लेकिन कसूर तो अपना ही है कि खुद एक तरफा मुहब्बत पर खुश होती रही। बगैर मुहब्बत जताए उसके दिल में अपनी दुनिया आबाद करने की कोशिश करती रही। उसे पता भी न था कि मैं उससे मुहब्बत करती हूं। मैं ने उससे यह भी न पूछा कि उसके दिन में कोई खाली जगह मेरे लिए भी है कि नहीं।

मुहब्बत की आग, अगर जले तो दोनों ही दिलों में जलनी चाहिए। उस एक की चाहत में जिसे सिर्फ तुम चाहती हो, उन चाहने वालों को जो तुम्हें चाहते हैं, खो न देना । देखना कि कहीं हाथ से वक्त का पक्षी उड़  न जाए। ऐसा न हो कि फिर सारी उम्र का पछतावा मुकद्दर बन जाए।” एक आवाज जाने कहां से कानों में गून्जी । इर्द गिर्द तो कोई भी न था। फिर यह आवाज। “नहीं नहीं…. अब मैं वक्त का पंक्षी अपनी गिरफ्त से निकलने न दूंगी।” एक दम ही मेरे मुंह से निकला। दो दिनों से मैं देख रही थी कि हारिस मुझे मुसलसल नजर अन्दाज़ कर रहे हैं।

न कोई बात और न कोई इसरार….? “एक्सकयूज़ मी!” मैं ने अपने कैबिन के पास से गुजरते हुए हारिस को पुकारा तो वह इस तरह रूके जैसे तेज रफतार गाड़ी को एक दम ब्रेक लगा दी गई हो। वह मुझे सवालिया नजरों से देख रहे थे। उनके चेहरे पर अब वह रौनक नगरी थी जो अकसर मुझसे बात करने पर दिखाई दिया करती थी। वह बेहद संजीदा थे। “फरमाईए।” वह खड़े खड़े ही रोबदार आवाज मैं बोले। कि “आज अपनी बातों पर गौर करने के बारे में नहीं पूछेगे?” मैं ने शोख और शरारती लहजे में अपनी आंखों की पुतलियों को अजीब तरह नचा कर पूछा तो वह बेयकीनी से मुझे देखने लगे। “आप का मतलब है कि आप…..?” उनके लहजे में बेयकीनी थी।

“हां।” “मगर इतने दिन आपने..?” उन्होंने शिकवा कर दिया। “मैं तो आप की लगन की हद का अन्दाज़ा लगाते हुए आप का इम्तिहान ले
रही थी।” मैं ने कहा, उनको क्या मालूम की हकीकत क्या है उन की मुहब्बत का इम्तिहान था या मेरी मुहब्बत की नाकामी।

– वह एक दम खुशी से उछल पड़े। उनके चेहरे पर बिखरे शोखरंगों की धनक दिखाई दे रही थी। मैं भी खुश थी कि मेरी हारी हुई सच्ची मुहब्बत ने हारिस की सच्ची मुहब्बत को जीत लिया था। अगले रोज़ वह अपनी मां और दूसरे घर वालों के साथ आए और मेरी अम्मां और भाई से मुझे मांग लिया। उन्होंने कोई एतराज़ न किया तो भला भाभी को क्या एतराज़ हो सकता था।

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