Romantic Story in Hindi // इश्क़ का जूनून 

Let`s Start Reading a True Romantic story in Hindi for lovers.

इश्क़ का जूनून

मेंरी हर रात उसके ख्वाबों के साथ बसर होती है और हर सुबह उसके चेहरे को देखकर होती है। जब तक मैं उसे देखनहीं लेता, मझे लगता है मेरे दिन की शुरूआत नहीं हुई। मैं बेचैन बेचैन सा फिरता हूँ। किसी काम में दिल नहीं लगता । जिन्दगी बोझ लगने लगती है। ख्वाह मख्वाह ही लोगों से झगड़ा करने को दिल चाहता है । हफ्ता और इतवार के दिन कयामत बनकर गुजरते हैं ।

मुझपर लोग हैरान हो जाते हैं कि मुझे क्या हो जाता है इन दिनों। मुझ जैसा नर्म और हँसमुख शख्स अचानक चिड़चिड़ाहट और खामोशी का शिकार क्यों हो जाता है। लेकिन मैं किसी को क्या बताऊं, मेरी तो खुद भी समझ में नहीं आता कि मुझे क्या हो गया है, क्या होता जा रहा है। शायद आप समझ रहे हों कि वह किसी कालेज में पढ़ती होगी और मैं कालेज के गेट पर या फिर किसी बस स्टाप पर खड़ा उसका दीदार करता हूंगा या फिर वह मेरे आफिस में काम करती होगी और मैं उसका…नहीं भई, नहीं। ऐसी कोई बात नहीं।

वह जिससे मैं मुहब्बत करता हूँ , मुहब्बत भी ऐसी जो अब दीवानगी बनती जा रही है, वह न तो कोई कालेज गर्ल है और न ही वर्किंग लेडी। वह तो घर में रहने वाली एक सीधी सादी शादीशुदा औरत है। दो अदद प्यारे बच्चों की मां । सुबह के ठीक साढ़े सात बजे रोज हमारी मुलाकात होती है इसलिए कि मैं उसके बच्चों को स्कूल ले जाने वाली वेन का ड्राइवर हूँ ।

Romantic story in Hindi for lovers written by ;- Haaris Hassan

__आप सब लोग यकीनन मुझ पर लानत भेज रहे होंगे कि मैं एक शादीशुदा औरत के इश्क़ में पागल  हूं। मगर मुहब्बत की तारीख बताती है कि मुहब्बत जात पात, रंग नस्ल और शादी या गैर शादीशुदा की कैद से आजाद है। दिल का कुछ पता नहीं होता कि वह कब किस पर आ जाए। औरत तो फिर भी अपने दिल के चारों तरफ एक लक्ष्मण रेखा खींच देती है मगर मर्द का दिल जैसे उल्टे तवे पर धरी मक्खन की टिकिया। इधर फिसली कि उधर फिसली। यह तो खैर आम मर्दो की खासियत बताई है मैंने।

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मैं अपने आप को आम मर्दो से थोड़ा मुख्तलिफ़ समझता हूं। मैंने अपने दिल को आज तक संभाल कर रखा हुआ था। कभी किसी को हाथ
नहीं लगाने दिया। उस औरत को भी नहीं जो आज से कोई पांच बरस पहले मेरी जिन्दगी में बीवी बनकर आई है। तहमीना मेरी बीवी जरूर
है मगर अभी तक मैंने उसे अपने दिल के बन्द दरवाजे के करीब बिठा रखा है। अन्दर आने की इजाजत नहीं दी है। अन्दर आने की इजाजत
भी उसे शायद मिल ही जाती अगर बीच में वह न आ जाती। वह वही है जिसकी मेरी आंखों को तलाश थी। जिसके लिए मैं बरसों से या शायद सदियों से मुन्तज़िर था। वह मेरी तलाश, मेरी जुस्तुजू, मेरा ख्वाब, मेरी दीवानगी है। उस पर पहली नज़र डालते ही मुझे यूं लगा जैसे मेरे हर ख्वाब को ताबीर (साकार) मिल गई हो। मैंने जाना कि चेहरे और शख़सीयत का हुस्न क्या होता अगरचे मेरी बीवी तहमीना भी काफ़ी
खूबसूरत है, मुझे भी वह अच्छी लगती है मगर अच्छी लगने और दिल को लगने में काफी फर्क होता है। तहमीना मेरी अम्मां और बहनों की
पसन्द है। मेरी पांच बहनें हैं। उन सबको एक के बाद एक ब्याहने में मुझे काफी वक्त लग गया और जब सब बहनें अपने अपने घर की हो गयीं
तो अम्मां को मेरी शादी का शौक चढ़ा और वह तहमीना को दुल्हन बनाकर ले आयीं । मैंने भी अम्मां की पसन्द को अपनी पसन्द बना लिया।

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_शादी अस्सी फीसद शादीशुदा जोड़ों के दरमियान मुहब्बत कम और समझौता ज्यादा होता है । मैं और तहमीना भी समझौते की डोर से बन्ध गए। हो सकता है तहमीना मुझसे सचमुच मुहब्बत करती हो मगर मैं कोशिश के बावुजूद उसके लिए कोई नर्म व नाजुक, कोमल सा जज्बा खुद से दिल में जागते महसूस न कर सका। मुहब्बत तो एक ऐसा सोता है जो धरती की कोख से अचानक ही उबल पड़ता है। ऐसा राग है जो बेइख्तियारी के मौसम में खुदबखुद होन्टों पर आ जाता है। मुहब्बत एक अन्जाना सा, अनदेखा एहसास है जो दिल में जन्म लेकर रूह तक को अपनी कैद में ले लेता है। और पहली बार उसे देखा तो यह अनछुआ, अनदेखासा एहसास मेरे दिल को छूता हुआ रूह तक पहुंच गया। मुझे अभी भी वह लम्हा याद है जब मैंने पहली बार उसे देखा। मई की तपती हुई दोपहर थी। मैं पसीने में शराबोर हो रहा था और ड्राइविंग सीट पर बैठा वेन में तमाम बच्चों के बैठ जाने का इन्तिजार कर रहा था। तब ही वह अचानक मुझे नज़र आ गई। उसने काली चादर ओढ़ रखी थी और
उसका चेहरा धूप की शिद्दत से गुलाबी हो रहा था।

करीब आकर उसने मुझे मुखातिब किया। मैं हैरत से उसे देखने लगा। उसके चेहरे की तरह उसकी आवाज की खूबसूरती मेरे कानों में रिमझिम फुवार सी बरसा गई । मुझे लगा कि जैसे आसमान पर आग बरसाते सूरजको काली घटाओं ने ढांप लिया हो । जैसे एकदम ही मेरे चारों तरफ ठन्डी हवाएं चलने लगी हों। और उन्हीं हवाओं ने मेरे संभाल कर रखे दिल को इधर से उधर कर दिया। मुझे खुद नहीं पता
चला कि क्या हुआ? कैसे हुआ ? बस मुझे उस लम्हे ने बेबस कर दिया।
वह लम्हा गुजरातो मुझे होश आया और मैंने सुनने की कोशिश की कि वह क्या कह रही ___मैंने अपने दोनों बच्चों को इस स्कूल में एडमीशन दिलवाया है। इन्हें लाने औरले जाने के लिए क्या फीस देनी पड़ेगी आपको?” वह गुनगुनाती आवाज़ में पूछ रही थी। “आप कहां रहती हैं ?” मैंने खोए खोए अन्दाज़ में पूछा। अगरचे यह कोई अच्छी बात न थी मगर मेरी निगाहें उसके चेहरे से हटने का नाम न ले रही थीं।
“मैं…नवेद के घर के पास ही रहती हूं। यहीं सिविल लाइन में।” उसने जल्दी से बताया तो मैंने हां में सर लिया।नवेद मेरीहीवेन में स्कूल आता था और उसके घर से स्कूल का कुछ ज्यादा फासला न था।

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“वैसे तो मैं एक बच्चे का दो सौ रुपए लेता हूं मगर आप दोनों के तीन सौ रुपए दे दीजिएगा, न जाने क्यों मैंने उसके साथ यह रिआयत की वरना आमतौर में किसी के साथ कोई रिआयत करने का आदी नहीं था। “अच्छा फिर मैं कल नवेद के घर पर बच्चों को लेकर आ जाऊंगी और आपको अपना घर दिखा दूंगी। गली के कार्नर वाला मकान है, सफेद कलर का गेट है।” वह पता बताने लगी। “बस मैं समझ गया। आप ज़हमत न कीजिएगा।मैं आपके गेट से ही ले लूंगा बच्चों को।” मैंने कहा- “नाम क्या हैं बच्चों के ?” मैं बात जारी रखना चाहता था।
“यह जारा है और यह रजा।” उसने दो अपनी ही तरह बेहद खूबसूरत बच्चों को करीब लाकर उनको इन्ट्रोडयूस कराया।
“अच्छा बच्चो! कल फिर मैं आ रहा हूं। साढे सात बजे आप लोग तैयार होकर गेट पर खड़े हो जाइएगा।” “जी अच्छा अंकल!” वह दोनों एक साथ बोले और अपनी अम्मी का हाथ पकड़कर आगे बढ़ गए।

मैं दूर तक उसको जाता हुआ देखना चाहता था मगर इस दौरान वेन भर चुकी थी और बच्चे शोरमचारहे थे इसलिएगाड़ी स्टार्ट करना पड़ी। लेकिन उससारा दिन उसका चेहरा मेरी आंखों के सामने फिरता रहा और मैं अपने रोज़मर्रा के कामों के साथ साथ उसे भी मुसलसल सोचता रहा। दूसरे दिन तहमीना के जगाए बगैर मैं उठकर बैठ गया और तहमीना हैरान रह गई क्योंकि उसे सुबह मुझे काफी देर तक जगाना पड़ता था तब जाकर कहीं मैं उठता था। उस रोजहर घर मैं वक्त से पहले ही पहुंच गया। मांए बेचारी बौखलाकर रह गयीं क्योंकि वह बच्चों को तैयार भी नहीं कर सकी थीं। कई जगह मुझे बच्चों का इन्तिजार भी करना पड़ा और खुशी खुशी किया जबकि आमतौर पर मैं इन्तिज़ार की जहमत गवारा नहीं किया करता था। बस एक दो बार हार्न बजाकर गाड़ी आगे बढ़ा दिया करता था। मगर उस रोज़ मैं बहुत खुश था। मेरे दिल में वाकई अजीब तरह कीनी आगई थी। लोग ठीक ही कहते हैं कि मुहब्बत आदमी को आदमी का दोस्त बनाती है। उसे जख्मों पर मरहम रखने का हुनर सिखाती है। मुहब्बत करनेवाले का दिल भी मोम हो जाता है। वह दूसरे का दर्द महसूस करना सीख जाता है । मैं भी उस रोज़ बहुत खुशमिजाज हो रहा था। बच्चों से भी मैंने प्यार मुहब्बत से बात की। न किसी को झिड़का और न किसी को डांटा और जब वेन नवेद की गली में दाखिल
होकर कार्नर वाले सफेद गेट पर रुकी तो हार्न बजाते हुए मेरा दिल धड़क रहा था और मेरी बेकरार निगाहें गेट परजमी हुई थीं। चन्द लम्हों
के इन्तिज़ारके बादगेट खुला और उसका चेहरा नजर आया। दोनों बच्चे तैयार थे और मां का हाथ थामे वेन की तरफ़ आ रहे थे। आज वह
कल से ज्यादा अच्छी लग रही थी। जैसे सुबह की गिरने वाली शबनम ने उसका मुंह धुलाया था फिर भी रात का काजल आंखों में लगा रह
गया था। गहरे फीरोजी सूट में उसकी गोरी रंगत बहुत नुमायां हो रही थी। बच्चों को बिठाकर वह ड्राइविंग सीट के करीब आई। मैंने गहरी सांस लेकर उसकी खुशबू को महसूस किया।

“प्लीज़ ज़रा ख्याल रखिएगा। ज़ारा और रजा को जल्दी छोड़ दीजिएगा क्योंकि अभी दोनों बहुत छोटे हैं।” वह दरख्वास्त कर रही थी।
__”आप फिक्र न करें। आपको कोई शिकायत नहीं होगी।” मैंने कहा औरगाड़ी आगे बढ़ा दी वरना तो दिल यही चाहता था कि वहीं खड़ा उससे बातें करता रहूँ ।बातें करते करते उम्र बीत जाए। उसके बच्चे चन्द ही दिनों में मेरे बहुत अच्छे दोस्त बन गए। मैं उन बच्चों की तरफ़ खास तवज्जोह देता था। शाइर लोग कहते हैं महबूब के दर का कुत्ता भी अजीज होता है तो वह तो जीते जागते इन्सान के बच्चे थे। मुझे इन बच्चों से न कोई चिड़या जलन महसूस होती थी औरनउनकेबापसे जिसे मैंने एक आध बार ही देखा था। ज्यादातर बच्चों को वेन तक छोड़ने वह खुद ही आया करती थी। उसका शौहर शायद सुबह सुबह ही काम पर चला जाता था।

__उसे मुझसे और मुझे उससे कोई शिकायत नहीं थी। मुझे इसलिए कि जिसे जान से ज्यादा अज़ीज़ मान लिया जाए, उससे शिकायत अच्छी
नहीं होती बल्कि होती ही नहीं। उसका सितम भी करम लगता है। उसकी ख़ता भी अच्छी लगती है। और उसे मुझसे इसलिए शिकायत नहीं थी कि मैं अपनी मेहरबानियां दिन ब दिन बढ़ाताजा रहा था। वेनमें रश होने के बावुजूद मैं उसके बच्चों को सीट पर बिठाकर लाता था।
अक्सर तो दोनों को अपने करीब बिठाता था। अगर बच्चे तैयार न होते तो मैं उसके गेट पर खड़े होकर इन्तिज़ार कर लिया करता था। मैं
तो सारी उम्र उसका इन्तिजार कर सकता था मगर………………..।

और फिर मई में पहली बार छुट्टियां पड़ीं तो मैंने डरते डरते गर्मियों की छुट्टियों की फीस तलब की। “छुट्टियों की फ़ीस ? मगर छुट्टियों में तो
बच्चे स्कूल नहीं जाते।” वह हैरान होकर बोली। “हां मगर… लेते हैं। सारे गाड़ी  वाले लेते हैं। आप किसी से मालूम कर लें।” मैंने शर्मिन्दगी से कहा।

“वह तो ठीक है मगर…।”वह कुछ फ़िक्र मन्द सी नज़र आने लगी- “आजकल इनके अब्बू की सर्विस कुछ डांवाडोल है। लोग निकाले
जा रहे हैं। कुछ डाऊन साइजिंग के नाम पर और कुछ गोल्डन शेक हैन्ड लेकर फ़ारिग किए जा रहे हैं। आपको तो पता ही है कि तालीम और
वह भी अच्छी तालीम इस ज़माने में किस कदर जरूरी है। यह समझ लें हम अपना पेट काट काटकर बच्चों को पढ़ा रहे हैं।” उसने बड़ी  सादगी से अपनी प्राब्लम मुझसे शेयर की। वह कुछ बातूनी सी थी और अक्सर खड़े खड़े दो चार बातें कर लिया करती थी। यह घरेलू औरतें अक्सर सब्जीवाले से, वेनवाले से, धोबी वगैरह से भी फ्री होकर बात कर लेती हैं। उस वक्त उनके जहन में यह नहीं होता कि हम मर्द हैं बल्कि वह हमें अपना दोस्त समझ कर अपने दुख सुख हमारे सामने खोल देती हैं। वह भी उस वक्त कुछ ऐसी ही कैफीयत का शिकार थी।

कोई बात नहीं है। अगर आपके पास इन्तिजाम नहीं हो सका तोपरीशान मत हों। मैने तो यूं ही तजकिरा कर दिया था। नहीं है तो न सही, मुझे एक घर से फीस न मिलेगी तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा।” मैंने हौसले से कहा। “अरे नहीं।” उसकी आंखों में शुक्रगुजारी के सितारे चमकने लगे- “आप जब सारे घरों से फीस ले रहे हैं तो फिर यह आपका हक है।” “दूसरे घरों को छोड़ें। आपकी बात अलग है।” मैंने गहरी निगाहों से उसे देखा। और वाकई उसकी बात अलग थी। वह मुझे सारी दुनिया की औरतों से अलग लगती थी। उस जैसी तो कोई भी नहीं थी। अब तो मुझे तहमीना, मेरी बीवी, अच्छी नहीं लगती थी। अपनी तमाम तर मुहब्बतों और खिदमतों के बावुजूद तहमीना मेरे दिल की मालिक न बन सकी थी।तहमीना की आंखों में मैं उसकी आंखें तलाश करता। तहमीना को बाजुओं में लेकर मैं उसके बारे में सोचता। मैं तहमीना के करीब था मगर जहनी तौर पर उसके पास न होता। सुबह सवेरे होने वाली चन्द लम्हों की मुलाकात मझे जिन्दगी का हासिल लगती थी।

मुझे खुद नहीं मालूम था कि इस लाहासिल मुहब्बत का  अन्जाम क्या होगा। नही अन्जाम का सोचता था। मैं तो बस सुबह दम खिलने
वाले चन्द फूलों की खुशबू के सहारे जिन्दगी गुजार रहा था। रज़ा और ज़ारा मुझसे बहुत खुलकर बातें कर लेते थे। कुछ बच्चों की बातों
से कुछ उसके कुम्हलाए हुए चेहरे से मैंने यह अन्दाज़ा लगा लिया कि उनके माली हालात बहुत खराब हो गए हैं। रजा, जारा से बड़ा और
समझदार था। वह मुझसे घर की बातें भी कर लिया करता था।

एक दिन उसने बताया कि उसके अब्बू की नौकरी खत्म हो गई है और वह नौकरी की तलाश में हैं। “अंकल! पता है अब हम आपकी वेन छोड़ देंगे। अम्मी कह रही थीं कि अब अब्बू हमें खुद स्कूल छोड़ आया करेंगे और ले भी आया करेंगे।”
वह सादगी से कह रहा था और मेरे दिल पर उसकी बात सुनकर क़यामत बीत गई। सुबह केवह खूबसूरत पल जिनके इन्तिज़ार में मैं सारा
दिन लम्हा लम्हा गिनकर गुजारता था, मुझसे दूर होने वाले थे। फिर भला मैं क्या करूंगा। मुझसे तो सनीचर और इतवार के दिन ही नहीं
कटते थे। मैं तो कहीं का नहीं रहूंगा। “नहीं नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। मैं ऐसा__ नहीं होने दूंगा।” मैंने मोड़ काटते हुए सोचा।

उस रात मैं बेचैनी से करवटें बदलता रहा और मैंने कितनी करवटें बदली थीं कि मेरे बराबर में मैगजीन पढ़ती तहमीना को भी मेरी बेकरारी का एहसास हो गया था। “क्या बात है, आप कुछ परीशान से हैं ?” वह अच्छी और मुहब्बत करने वाली बीवियों की तरह फौरन मैगजीन एक तरफ डालकर फिक्रमन्द हो गई। “कुछ नहीं, नीन्द नहीं आ रही है।” मैंने बेजारी से कहा । किसी से भी बात करने का दिल नहीं चाह रहा था। “सर में तेल डाल दूं? खुश्की न हो गई हो।” उसकी सोच बस यहीं तक जा सकी। – “नहीं भई, इतनी गर्मी में तेल।” मैं घबरा गया- “तुम सो जाओ। मुझे भी नीन्द आ ही जाएगी। शायद खाना ज्यादा खा लिया है। इसकी वजह से पेट भारी भारी सा है।” मैंने बहाना बनाया और उस सादा भोली औरत ने फौरन मेरी बात का एतबार कर लिया। दूसरी तरफ करवट लेकर उसने आंखें बन्द करली और थोड़ी देर बाद वह बेखबर सो रही थी। जबकि मैं अपने इश्क की सड़क पर आ जाने वाले इस भारी पत्थर को सरकाने की कोई तरकीब सोचने लगा।

*****

“आपकी फीस इस बार बहुत लेट हो गई। अस्ल में उनकी नौकरी खत्म हो गई है ना तो हम लोग बहुत क्राइसेस से गुजर रहे हैं।’ वह ड्राइविंग सीट की खिड़की के करीब खड़ी मुझे बता रही थी। “ओह ! बहुत अफसोस हुआ सुनकर। घबराएं नहीं, खुदा कोई दूसरा रास्ता  खोल देगा, मैंने लहजे में हमदर्दी घोलकर कहा। मुझे लगा जैसे उसकी आंखों में हलकी हलकी सी नमी तैर रही है। उसने हाथ से तरफ बढाया जिसमें सौ सौ रुपए के नोट थे। “यह…यह क्यों दे रही हैं आप?” मैं कुछ न समझते हुए बोला। “अरे यह आपकी पिछले महीने की फीस है । इसे रखले फिर आगे का अल्लाह मालिक है।” वह दुख से बोली।
– “आप यह फीस अपने पास रखें। प्लीज आप इसे रख लें। मुझे इसकी ज़रूरत नहीं है। जब रजा के अब्बू को नौकरी मिल जाए तो दे दीजिएगा। अभी में एक पाई भी नहीं लूँगा । रजा औरजारा मेरे अपने बच्चों जैसे हैं।” मैंने जज्बाती होकर कहा। “क्या वाकई?” उसके लहजे में बेयकीनी भी थी और खुशी के धुंघरूओं की झनक भी।

__ “अंकल! मैं आगे आकर बैठ जाऊं?” रज़ा बैग कन्धे से लगाए सामने आकर बोला।
“अंकल नहीं, अब इन्हें तुमलोग मामू कहा करो। यह तुम्हारे मामू हैं आज से।” वह तड़प कर बोली। लहजे में जोश था।
– लेकिन उसकी बात सुनकर मेरे होश उड़ गए- “मामू…मामू…मामू!”

मेरे इर्द गिर्द खड़े  मेरी पांचों बहनों के बच्चे चिल्लाने लगे। रजा और ज़ारा ने भी उनके साथ आवाज मिला दी- “माम् ! मामू जान!”
वह मुस्करा रही थी मगर मेरा जी रोने को चाह रहा था। उसके सरापे से उलझती निगाहें अपने  आप ही आप झुक गई थीं। शायद रिश्तों का
तकददुस (पवित्रता) याद आ गया था । मुहब्बत दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपाए बैठी थी और मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मुझे किसी ने मुझे बहुत ऊँचे भवन की छत से जमीन पर धक्का दे दिया हो।

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