Story for love in hindi // हाँ मैं हार गई ……

Let`s start reading a true story for love in hindi 

 
हाँ मैं हार गई 

 

मारिया ! तुम्हारे इस फलसफे को मैं गलत समझती हूं कि मुहब्बत हो जाती है। ग़लत, सरासर गलत । मुहब्बत तो की जाती है, स्टेटस देखकर, सब कुछ देख भाल
कर कि वह हमारे काबिल है भी या नहीं।” “तुम गलत कह रही हो सबा ! मुहब्बत
जात, पात, धर्म, रंग, नस्ल नहीं देखती बल्कि यह तो एक अजीब सा जज्बा होता है अनदेखा
और यह इतनी खामोशी से और खुद रूह में घर कर जाता है कि हमें उसका एहसास तक नहीं होता । यह तो वह जज्बा है जो लहू बनकर रगों में समा जाता है। “प्लीज बस करो।” सबा मारिया की लम्बी चौडी तकरीर सुनकर चिड़सीगई- “भई
मुझे तो नीन्द आ रही है।” सबा चादर लपेट कर और करवट बदलकर सो गई और मारिया
बड़बड़ाने लगी।
_ “अरे अभी तक सो रही हो । यूनीवर्सिटी नहीं चलनाक्या । उठोदेर हो रही है।” मारिया
ने सबा को झिन्झोड़ कर उठाया- “मेम साहब तो ऐसे सो रही हैं जैसे ख्वाब में किसी आशिके
नामुराद को देख रही हों।” “यह सुबह ही सुबह इश्क और आशिकी
का ख्याल क्यों कर आया ?” सबा ने जमाई लेते हुए कहा।
“इसलिए कि हम आपको इश्क के सही फलसफ़े से आशना कराना चाहते हैं।” मारिया
ने कहा। सबा  चिढ़ गई- “बकवास बन्द करो और मेरा सूट प्रेस करके दो।” यह कहकर मारिया बाथरूम में घुस गई।

story for love in hindi

वह दोनों हम उम्र होने के साथ साथ चचा जाद बहनें भी थी । ज्वाइन्ट फैमिली थी और
फिर दोनों फैमिली में प्यार मुहब्बत थी। और फिर अनवार साहब और अकरम साहब का
बिजनिस भी एक ही था । अकरम साहब के दो बच्चे सबा और वक़ास थे जबकि अनवार साहब की एक ही बेटी थीमारिया। जिस तरह बड़ों
में प्यार मुहब्बत और खुलूस था उसी तरह बच्चों में भी मुहब्बत थी। कभी लड़ाई झगड़ा नहीं हुआ उनमें।
यूनीवर्सिटी में केमिस्ट्री का पीरियड चल रहा था और सर आमिर लेक्चर दे रहे थे।
मारिया और सबा दोनों सन्जीदगी से लेक्चर
नोट कर रही थीं।

कहते हैं औरतों की छटी हिस बड़ी तेज़ होती है और फ़ौरनमहसूस कर लेती है कि कोई
उन्हें देख रहा है। सबा को जो जरनल परझुकी हुई लेक्चर के प्वाइन्ट नोट कर रही थी, किसी की नज़रें उस पर चुभती सीमहसूस हुयीं। उसे यं लग रहा था जैसे किसी की निगाहें उस पर लगी हुई हैं। वह बेचैनसीहो गई। उसनेनजरें उठाकर इधर उधर देखा।
‘मिस सबा!”
सर आमिर ने दूसरी बार कहा तो वह
चौंकी-‘जी सर! आपने मुझसे कुछ कहा?” सबा के इस तरह से बौखलाने पर सारी
क्लास हंस पड़ी। वह और ज्यादा बौखला गई और सारी कहकर वह क्लास रूम से बाहर आ
गई।
“सबा! आज क्लास में तुम्हें क्या हो गया था, किसे तलाश कर रही थीं?” मारिया ने पूछा।
“आंहां, कुछ नहीं। किसी को भी नहीं।”
उसने खोए खोए लहजे में कहा। सबा को यूंमहसूस होनेलगाजैसे दो आंखें
हर वक्त उसे देखती रहती हैं। सबा झुन्झला सी गई।
“आखिर वह है कौन? किसकी आंखें हैं ? वह जो कोई भी है उसे अपनी तरफ़ अट्रेक्ट नहीं
कर सकता। वह समझता क्या है आखिर इस तरह की घटिया हरकत करने से वह मुझे अपनी
तरफ माइल कर लेगा। ऊह यह गलत फहमी है उसकी।” वह सोचों में गुम थी।
“किसकी गलतफहमी है ? किससे बातें कर रही हो अकेले में ?” अचानक ही मारिया
आ गई।
सबा बौखला गई जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो लेकिन अब बताने के अलावा चारा भी
नहीं था क्योंकि मारिया उसे छोड़ने वाली नहीं थी।
सबा ने मारिया को सब कुछ बता दिया  | 

और मारिया खिलखिला कर हंस पड़ी-“मेरी जान! अब पता चलेगा मुहब्बत क्या चीज़ है।”
“बकवास बन्द करो, मुझे किसी से मुहब्बत नहीं है।”
“है नहीं तो हो जाएगी बन्नो!” सबा ने मारिया को गुस्से में कुशन फेंक
कर मारा जो उसने खूबसूरती से कैच कर लिया। “मैं नहीं मानती कि मुहब्बत एक नज़र
में हो जाए और किसी गैर को अपना सब कुछ मानले । मैं इस नज़रिये को नहीं मानती हूं।”
सबा ने कहा।
__ “मेरी जान ! सिन्ध के सूफ़ी शायर के सय्यदों की एक लड़की की उंगली देखकर इश्क़
हो गया था तो तुम किस खेत की मूली हो । तुम्हें अपना नजरिया बदलना होगा।” मारिया ने
उसकी मालूमात को बढ़ाया। “यह नामुमकिन है। अच्छा छोड़ो, यह
बताओ गिफ्ट पैक किसलिए लाई हो?” सबा ने उसे याद दिलाया।
“अरे हां, यह आपके लिए नहीं है। माबदौलत को किसी ने दिया है।” अभी मारिया ने बात भी पूरी नहीं की थी कि सबा ने गिफ्ट पैक उसके हाथसे झपटलिया।

‘डियर मारिया!
जन्मदिन मुबारक हो । मेरी तरफसे प्यार की पहली सीढ़ी समझ कर मेरा तोहफ़ा कबूल
करो। मैं तुम्हें जल्द से जल्द अपना बनाने की कोशिश में लगा हुआ हूं। तुम दुआ करना।
तुम्हारा-वकास” सबा उछल पड़ी- “यह तुम दोनों ने कब
से शुरू किया?”
 “पता नहीं कबसे।” मारिया शर्मिन्दा हो गई। सबा तो खुशी से उछल पड़ी और मारिया
को चूमकर कमरे से बाहर दौड़ी ताकि यह खुश खबरी सब लोगों को सुना सके । मारिया उसे रोकती रह गई।
घर में एक खुशी की लहर दौड़ गई। बड़े छोटे सबखुश थे। बड़ों ने मारिया और वकास
को एक डोरमें बान्धने का फैसला किया। इस तरह मंगनी एक हफ्ते बाद की ठहरी और शादी वकास की फारेन बिजनिस मेनेजमेंट का कोर्स
मुकम्मल करके आने पर ठहरी।
वकास तो यूं खुश था जैसे उसे दोनों जहां मिल रहे हों। इधर मारिया की खुशी का भी
कोई ठिकाना न था। खुदा खुदा करके मंगनी का दिन आया।
मारिया आफ़व्हाइट शरारे में किसीहूर से कम नहीं रही थी। सबा ने आकर उसे चूमा और
उसके साथ आकर स्टेजपर बैठ गई और उससे
बातें करने लगी।

बातें करते हुए वह एकदम से चौंक सी गई। उसे फिर किसी कीनज़रों की तपिश अपने
वुजूद में सरसराती हुई महसूस हुई। उसके नाजुक दिल की धड़कन बेकाबू सी होने लगी।
वह बेचैननज़रों से हाल में बिखरे कहकहे लगाते
लोगों को देखने लगी। “सबा! मंगनी की अंगूठी लेकर आओ।
भई रस्म शुरू करें।” सबा की अम्मी ने कहा तो वह चौंकी और
अच्छा कहकर उठी। अचानक लाइट चलीगई। वह अन्धेरे में रास्ता ढून्ढते हुए कमरे की तरफ़ जाने लगी तो किसी से टकरा गई। इससे पहले
कि वह गिरती किसीनेउसे बाहों से थाम लिया। उसके मुंह से अचानक एक चीख निकल गई और उसी लम्हे लाइट भी आ गई।
“आंखें…यहीं हैं वह आंखेंहां।” एकदम से दिमाग में ख्याल सा कौन्दा और ज़बान से
एकदम से निकल गया- “सर! आप यहां?” “जी मैडम ! मैं दावत में बुलवाया गया
हूं। यूं ही नहीं चला आया।” सामने से वकास चला आया और बोला-
“अरे सबा! इनसे मिलो। यह मेरे दोस्त हैं।

आमिर को हाल में ही यूनीवर्सिटी लेक्चररशिप जाब मिली है । शायद तुमने इन्हें देखा हो।”
अब वह वकासको क्या बतातीकियह सर आमिर उनकी क्लास का पीरियड लेते हैं।
शर्मिन्दा होकर वह वहां से खिसक ली। अब सर आमिर उसे बेतकल्लुफी से
पुकारते थे। वह उनकी निगाहों को अपने पर मन्डलाते महसूस करके परीशान होजाती। उसे उलझन होने लगती। लोग उसके नाम के साथ
सर का नाम भी लेने लगेहालांकि वह कभी सर आमिर के साथ देखी नहीं गई और नही वह कभी उनके रूम में गई थी। “मारिया ! मैं लोगों को कैसे समझाऊं।
वह तो बस बात का बतंगड़ बना लेते हैं और सरको भी कैसे समझाऊं कि वह इस किस्म की_हरकतें न करें।” सबा ने परीशानी से कहा।
“मेरी जान ! वह हरकतें नहीं तुमसे मुहब्बत करते हैं। तुम भी सीधे सीधे उनकी
मुहब्बत का जवाब मुहब्बत से दो और फिर वह ऐसे कोई खराब आदमी तो नहीं हैं । सन्जीदा किस्म के इन्सान हैं । और तुम्हारे मुआमले में
वह काफी सन्जीदा हैं।” मारिया ने उसे समझाया।
– “प्लीज़ मारिया ! अगर मुझे मुहब्बत ही
– करना होता तो वह लड़के क्या कम थे जो मेरे
_ आगे पीछे फिरते थे और उस वकार में क्या कमी थी जो मेरी से इलेक्शन हार गया था। प्लीज मारिया ! मैं मुहब्बत की काइल नहीं हूं। तुम
 समझती क्यों नहीं हो।” सबा ने कहा। “नहीं सबा ! तुम एक अना परस्त लड़की
हो। अगर तुम्हें मुहब्बत हो भी गई तो सिर्फ अपनी झूटी अना की खातिर झूटी तस्कीन की
वजह से इकरार नहीं करोगी। तुमने अपने आस पास हिसार (घरा) बना रखा है। इसको तोड़कर बाहर निकलकर देखो क्योंकि तुम भी एक दिल
रखती हो।” यह कहकर वह आगे बढ़ गई। सबा उसे देखती रह गई। उसे यकीन नहीं

आ रहा था कि मारिया उसे यूं अकेला छोड़ देगी। वह जो उसकी साथी थी, उसकी हमराज़ थी
मगर आज वह उसे बीच मंझधार में तन्हा छोड़ गई जब उसे किसी की जरूरत थी। अब वह
तन्हा थी, जो भी करना था अब उसे अकेले ही करना था। वह बोझल क़दम उठाते हुए आगे
बढ़ी।
_थोड़ी ही देर में वह सर आमिर के कमरे के सामने खड़ी थी। “यस कम इन।” रौबदार आवाज़ गूंजी और सबा के कानों से टकराई।
वह किसी रोबोट की तरह कुर्सी पर आकर बैठ गई और बात करने के लिए अल्फ़ाज़ ढून्ढने लगी। उसे लगा जैसे उसकी बोलने की ताकत
खत्म हो गई हो। अल्फाज़ उसका साथ नहीं दे रहे थे। उसे लगा लोग उसकी बेबसी पर हंस
रहे हों, खुशी से नाच रहे हों । बह शर्म से पानी पानी हो रही थी। वह जोक्लास में बहुत बोल्ड,
जबान दराज़ और हाज़िर जवाब कहलाती थी आज उसका दिमागउसकी ज़बानका साथ नहीं दे रहे थे जैसे उसके होन्ट सिल गए हों और एक दूसरे से जुदा होने के लिए जहन शल हो रहा था जैसे कोई छोटा सा बच्चा अपने मां बाप से बिछड़ कर किसी गैर मुल्क आ गया हो।
“मैं जानता हूं आप क्या कहने आई हैं।” सर आमिर ने खामोशी तोड़ी- “आप यह कहने
आई होंगी कि मुहब्बत के जज्बे को आप नहीं मानतीं और यह कि मेरी मुहब्बत सिर्फ ड्रामा
है, झूट है, अदाकारी है, फरेब है, सौदा है, धोका है। है ना यही बात?”
सर आमिर ठहर ठहर कर बोल रहे थे- “सबा अकरम! मैं आपसे मुहब्बत करता हूं और
करता रहूंगा। मुहब्बत अपमा रंग खुद ही दिखाती है । एक वक्त आएगा जब आप खुद
इस बात का इक़रार करेंगी।” “सर!” सबा ने उनकी बात काटी-
“सारी सर! मैं शादी से पहले मुहब्बत पर यक़ीन नहीं रखती। मेरी तमाम तर मुहब्बतका हकदार होगा मेरा शरीके हयात, मेरा शौहर क्योंकि मैं उससे मुहब्बत करूंगी।” सबाने रुक रुक कर कहा- “न कि वह फ़लसफ़ा कि मुहब्बत हो जाती है। मैं उसे नहीं मानती। हां अगर ज़िन्दगी में किसी लम्हे मुझे यह महसूस हुआ तो मैं इसका
इक़रार ज़रूर करूंगी।” सबा ने टूटे लहजे में
कहा। “अगरआपझ्ट का सहारा लेना चाहें?” “इसकी नौबत नहीं आएगी।”
“मिस सबा अकरम ! आपको भी मुझसे मुहब्बत है। आप चाहें इस बातका इकरार आज
करें या जिन्दगी के किसी और मोड़ पर । आप मेरे बगैर खुश नहीं रह पाएंगी।”
आमिर खान ने इतने मज़बूत लहजे में कहा कि सबा तो लम्हे भर के लिए सहम गई।
उसकी हालत अजीब सी हो रही थी जैसे सब कुछ थम गया हो, वीरानी वीरानी सी हो
मगर क्यों, यह वह समझ नहीं पाई। एक
इन्किशाफ़ मगर नहीं यह हो सकता है। वह लम्हे भर को सहम गई।
कई दिनों से उसने यूनीवर्सिटी जाना भी छोड़ दिया था। सारा वक्त घर में रहती।
मारिया जो उसकी हमराज थी, उसे भी वह कुछ नहीं बताती थी। मारिया पूछ पूछ कर थक गई मगर सब बेकार।

story for love in hindi

-सबा खामोश खामोश बौखलाई सी हर वक्त घर में फिरती रहती। उसकी यह हालत
घर वालों से छुपी हुई नहीं थी। “सबा! सबा!” मारियाचीखती हुईकमरे
में आई- “कहां हो भई, तुम्हारे लिए एक खुशखबरी है।”
“क्या है ?” सबा ने बेज़ारी से कहा। “पता है चचाजान ने तुम्हारी शादी करने
का फैसला कर लिया है।” मारिया ने धमाका किया।
“क्या? किससे? क्या कह रही हो तुम?”

सबा फट पड़ी। “धीरज धीरज, बताती हूं मेरी जान !” मारिया ने रुक रुक कर बताना शुरू किया- “वह चचा जान के दोस्त हैं ना, उनके बेटे का
प्रपोजल आया है तुम्हारे लिए।”
“नहीं यह नहीं हो सकता।” वह रो पड़ी। “हां मैं इक़रार करती हूं कि मुझे तुमसे
मुहब्बत है। हां मैंने माना कि मुहब्बत कोई चीज नहीं पूछती, वह तो हो जाती है। हां मैं हार गई,
तुम जीत गए आमिर खान! तुम जीत गए।” वह जो सब कुछ अपने दिल में छुपाए बैठी
थी ज़रा सी ठेस लगने पर फट पड़ी। वह बेखुदी के आलम में सब कुछ कह गई।
मारिया सकते में उसकी शक्ल देखने लगी। किसी हद तक तो मारिया को भी पता
था मगर इतनी संगीन सूरते हाल का उसे मालूम न था।
– “सबा ! तुम जैसा चाहोगी वैसा ही होगा।” उसनेसबाको तसल्ली दी- “मैं चचा
जान से खुद बात करूंगी। अब तुम उठो, पता है तुम्हें, केमिस्ट्री के सरकी तबीअत बहुत खराब है। वह बहुत दिनों से यूनीवर्सिटी भी नहीं आ रहे हैं । हम सब उन्हें देखने के लिए गए थे।
तुम्हें इसलिए नहीं बताया कि कोई फायदा नहीं था। अब उठो शाबाश, चलें उनके घर । और
हां, उनके लिए फूल ले लेना ताकि कुछ तो आसरा हो दिल की भड़ास निकालने का।”
_और फिर वह सबकुछ हो गया, धरती पर जैसे हसरतों के पहाड़ टूट पड़े। सब हैरत में रह
गए। तमाम मन्ज़र हैरत का निशान पेश कर रहे थे जैसे कोई अनहोनी सी हो गई थी।

हां अनहोनी तो थी, इतनी मुहब्बत,  इतनी चाहतों के बावुजूद जिसकी कम से कम मारिया को उम्मीद न थी।

सबा खुशीखुशी अपनी शादी की तैयारियों में मसरूफ़ थी जैसे अपनी जीत पर जश्न की तैयारियां कर रही हो या कोई किला फतह करने जा रही हो जैसे अपने खुदा पर, अपने आप पर बहुत नाज़ और भरोसा और यक़ीन हो।
_एक दिन मौका पाकर मारिया ने सबा को पकड़ ही लिया- “सबा! यह क्या ड्रामा है,क्या
मजाक है यह ? एक तरफ़ तो तुम आमिर से मुहब्बत का इज़हार कर चुकी हो और दूसरीतरफ़ अदनान से शादी की तैयारियां कर रही हो। क्या
पागलपन है यह?” मारिया झुन्झलाई। “लो यह पढ़ो।” सबा ने एक ख़त उसके
हवाले किया।
“क्या है यह?”मारिया ने हैरत से पूछा। “आमिर खान साहब के लिए मेरी शादी
का कार्ड और एक ख़त जो उन्हें उस वक़्त मिलेगा जब मैं किसी की हो चुकी होऊंगी।” सबा की आवाज़ कुएं से आती महसूस हुई।
“आमिर खान साहब!
आपका यह दावा था कि मैं आपसे महब्बत का इक़रार ज़रूर करूंगी सो मैं कर रही हूं कि मैं आपसे मुहब्बत करती हूं। हां मैंने यह इक़रार किया कि मैं बाज़ी हार गई और आपको यह
अपनी जीत मुबारक हो। लेकिन एक लम्हे के लिए सोचें कि एक फ़ीक़ फातेह और दूसरा
इन्सान हारा हुआ हो तो जिन्दगी किस तरह खुशगवार बना सकते हैं। मुझे हर लम्हे अपनी
हार का एहसास सताएगा और इस तरह से न मैं खुश रह पाऊंगी औरन आपको हीखुश रख
सकूँगी । मेरी आपसे गुजारिश है कि एक हारा हुआ इन्सान अपनी हार का जश्न किस तरह
मनाता है आप आकर देखें तो सही। फ़क़त आपकी मगर… सबा अदनान”
वह स्टेज पर अदनान शाह के साथ बैठी बहुत मुतमईन नज़र आ रही थी कि उसे जिन्दगी
में अपने हमसफ़र के साथ किसी भी वक्त किसी भी लम्हे अपनी हार का एहसास नहीं होगा।
और उसने अपना सब कुछ अदनान शाह के नाम कर दिया था।

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