Majedar kahani bacho ka hindi main // सच की जीत

प्यारे बच्चो – आज मैं आपके लिए एक majedar kahani ले कर आया हूँ और बच्चो मुझे पूरी उम्मीद है आपको ये कहानी बहुत पसंद  आएगी। ये दो सच्चे मित्रो की एक majedar kahani है |

सच की जीत 

दो मित्र थे। एक था सच्चा और एक झूठा । सच्चा महान सत्यवादी था। उसने हमेशा सच बोला। चाहे सत्य कड़वा हो,चाहे कसैला, पर वह हमेशा सच ही बोलता था। इसके विपरीत झूठा हमेशा झठ बोलता था। झूठ बोलने से कोई लाभ हो रहा हो या नहीं लेकिन वह झूठ ही बोलता था।

सच बोलने से कोई अंतर न पड़ रहा हो या सामने वाला कितना ही महत्वपूर्ण व्यक्ति हो, लेकिन झूठ  बोलना उसकी आदत थी तो,झूठ ही उसके मुँह से निकलता । एक तरह से सच्चे को सच बोलने की आदत थी तो झूठे को झूठ बोलने की लत।लेकिन दोनों के बीच कुछ ऐसी ‘आपसी समझ थी कि दोनों की मित्रता चल रही थी।

दोनों  एक दूसरे के विपरीत  थे। और विपरीत बातें बोलने से दोनों की ही स्थिति अजीबोगरीब हो जाती थी, परन्तु फिर भी मित्रता चल रही थी। लेकिन सबसे गड़बड़ बात यह थी कि सच्चा सच बोलते हुए परेशानी में फंसता था  और झूठा फायदे में रहता था। एक दिन दोनों किसी के घर गए । दोपहर के भोजन का समय था। घर के लोगों ने पूछा, “भोजन करके आए है या लगाएं ?” “भोजन नहीं किया ।” सच्चे ने बता दिया। किन्तु झूठा बोला, “हम तो खाकर आए है।”

घर के लोगों ने धारणा यह बनाई कि सच्चा  झूठ बोल रहा है। वह लालची और कम नीयत है। झूठे  को उन्होंने सभ्य और सच्चा व्यक्ति मान लिया। इसी तरह एक दिन एक स्कूटर वाले को किसी ट्रक ने टक्कर मार दी। यह दुर्घटना दोनों दोस्तों के सामने घटी । उसी वक्त पुलिस आ गई।

आसपास खड़े लोगों से पुलिस ने पूछताछ की। झूठे से पूछा तो बोला, दुर्घटना होने के बाद “हम तो अभी अभी आ ही  रहे है ,  ।” मुझे कुछ नही पता |  सच्चे का नंबर आया तो उसने कह दिया “एक ट्रक ने स्कूटर के पीछे से टक्कर मारी।” “आपने ट्रक  का नंबर देखा होगा?” पुलिस में पूछा तो सच्चे ने हाँ कहकर नंबर बता  दिया। अब तो पुलिस ने सवालों की बौछार कर दी। झूठा से पीछे से चिंगोटी काटता हुआ बताता रहा कि ‘चुप  रहे, लेकिन सच्चा अपनी आदत से मजबूर था । वह सारी घटना बयान करता रहा। पुलिस ने उसका नाम, पता, पिता का नाम आदि सब कुछ नोट कर लिया । उसके बाद आज दो साल से सच्चा उस मामले में चक्कर काटता फिर रहा है, जबकि झूठा साफ बच निकला। कितना समय बर्बाद हुआ है, कितना पैसा , यह सच्चा ही जानता है। ऊपर से ट्रक वाला  धमकी अलग देता है। पुलिस वाले  बातचीत में बदसलूकी अलग करते है।

एक दिन सच्चा और झूठा एक पुल के ऊपर से गुजर रहे थे। दोनों एक जगह खड़े होकर नीचे की ओर झांकने लगे। तभी वहाँ टंगा टिन का एक होडिंग नीचे गिर गया। नीचे एक कार पर गिरा । कार का शीशा चकनाचूर हो गया और कार पर ‘डेंट ‘ भी पड़ गया। दोनों मारे डर के तेजी से पुल से उतरे और भागने लगे। कुछ दूर पहुंचे थे कि चार लंबे-चौड़े लड़के पीछे आते दिखाई दिए। वे लोग आपस में बातें कर रहे थे- ‘शायद यही है। कोई कह रहा था- “नहीं ये दोनों नहीं है।” झूठे ने उनकी बात सुनी और घबरा गया। तभी लड़के उनके करीब आ गए। इन चारों ने उन्हें घेर लिया। एक ने पूछा, “क्यों होडिंग तुम्हीं ने गिराया है ना?” “क्या गिराया ?” झूठे ने उलटा प्रश्न किया । चारों लड़के आवारा किस्म के थे  । एक ने दोहराया, “अंधे  के साथ-साथ बहरे भी हो क्या ? होडिंग क्यों गिराया ?” झूठा बोला, “आप क्या बोल रहे है? है? हम लोग कॉलेज  में पढ़ते हैं । होडिंग-बोर्डिंग का घंधा हम नहीं करते ।”

लड़के एक-दूसरे का मुँह देखने लगे । उन्हें लगा, गलत लोगों को पकड़ लिया। वे लौटना ही चाहते थे कि एक लड़के ने सच्चे की कमीज को पकड़ कर कहा, “यही शर्ट मैने देखी। क्या तुम पुल से नहीं आ रहे थे  ” “हम क्यों पुल से आएगे भाई, हमारा रास्ता सीधा है।”-झूठा फौरन बोला, लेकिन सच्चा अपनी आदत से बाज नहीं आया । कहने लगा, “हम पुल से ही आए ।” वह सुनते ही झूठा सिर पर पैर रख कर दौड़ पड़ा। दो लड़कों ने कुछ दूर तक उसका पीछा किया, किन्तु फिर यह सोच कर लौट आए कि कहीं दूसरा हाथ से न निकल जाए । तब तक बाकी दो लड़कों ने सच्चे से पूछा, “तो तुम्ही ने होर्डिंग गिराया ?” “जान-बूझ कर नहीं गिराया, बल्कि गिर पड़ा।” सच्चे ने साफ बात कह दी। तभी एक लड़के से उसके मुँह  पर झापड़ रसीद कर दिया ।

फिर तो बाकी दो लड़के भी आ गए थे और सभी ने मिलकर उसकी ताबड़तोड़ पिटाई की। दो लड़कों ने उसकी जेब में हाथ डाल कर दो-ढाई सौ रुपए भी निकाल लिए। ऊपर से उसका थोबड़ा अलग सूज गया। पिटने के बाद जब वह बस स्टॉप पर पहुँचा तो झूठा  वहीं मिल गया । झूठे  ने उसकी हालत देखी और दंग रह गया । बोला, “वाह रे सत्यवादी हरिश्चंद्र । ऐसा भी सच क्या बोलना कि पिट जाओ। आखिर तुझे जीवन में सच बोलने का कभी तो कोई लाभ  हुआ होता ? सच्चा  मुँह  लटकाए रहा। कुछ बोला नहीं। लेकिन उसने मन ही मन सोचा कि शायद झूठा  ठीक कह रहा है। झूठे ने उसकी मन की बात समझते हुए कहा, “ठीक है तो आज के बाद सच बोलने से तौबा कर ले | तुम खुद तो पिटा ही  में भी पिटते-पिटते बचा।”

सच्चा बोला, “मुझे नहीं लगता कि अब मैं झूठ बोल पाऊंगा। वैसे भी हमेशा यही सुना है कि सत्य की विजय होती है। इसलिए मैं अपने सत्य की जीत देखना चाहता हूँ।” “ठीक है तो देख। जब तक तेरा सत्य जीतेगा, तू जिन्दगी से हार चुका होगा।” उस दिन सच्चा काफी सोच-विचार करता रहा । किन्तु सच्चाई के रास्ते को छोड़ने की इच्छा होते हुए भी साहस नहीं हो रहा था।

एक दिन सच्चा और झूठा फिर एक साथ एक घर में गए । उस घर में एक युवती थी जो काफी सुंदर थी । युवती सौंदर्य प्रतियोगिता में भाग लेने और फिल्मों में काम करने के सपने देखा करती थी। उसने सच्चे-झूठे को भी बातचीत में अपनी इच्छा के बारे में बताया । झूठा उसकी प्रशंसा करता हुआ बोला, “आप मिस इंडिया तो बन ही जाएगी । और हो सकता है मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता भी जीत लो । वरना, पहली या दूसरी उपविजेता तो रहेगी ही।”

वह युक्ती फूल कर कुप्मा । पूछने लगी, “और अगर फिल्मों में ट्राइ मारू?” तो पहली बार में ही किसी अच्छे निर्देशक की बड़े बजट की फिल्म में काम मिल जाएगा।” युवती ने सच्चे को चुप देखा तो उससे भी पूछा, “आपकी भी यही राय है?” “नहीं। आप बुरा मत मानिएगा, लेकिन आपके दाँत आधे तो सड़े हैं और आधे बेतरतीब । आप चुप रहती हैं तो सुंदर लगती है । लेकिन हँसते या बोलते ही आपकी पोल खुल जाती है। हाँ, आपको सफलता मिल सकती है, बशर्ते आप अपने सारे दाँत उखड़वा कर नकली दाँत लगवा लो और यह बात कभी किसी को पता न चले ।” लड़की को काटो तो खून नहीं । शर्म से पानी-पानी हो गई ।

क्रोध इतना आया कि पूछो नहीं । मन तो हुआ सच्चे को धक्के मार दे । लेकिन उसने ऐसा नहीं किया, बल्कि जवाब दिया, “तुम बहुत ही घटिया किस्म के आदमी हो। तुम्हें सुंदरता के बारे में तो पता ही नहीं है । लेकिन बुरी बात भी किस तरह कही जाती है इसकी तमीज भी नहीं। यह अपमान धक्के मारने जैसा ही था। सच्चा उठ कर चला गया। झूठा फिर भी झूठी तारीफ

करता रहा, किन्तु अब उस युवती का उत्साह खत्म हो चुका था। उसने झूठे को भी सिर्फ इसलिए मुँह नहीं लगाया क्योंकि वह सच्चे के साथ आया था। इस घटना के बाद दोनों दोस्तों में झगड़ा हुआ ? झगड़े के दौरान सच्चे ने मान लिया कि वह सच नहीं बोलेगा । इससे झूठा खुश हुआ और दोनों की तकरार फिर खत्म हो गई। फिर से दोनों साथ रहने लगे।

एक दिन फिर एक घटना घट गई। दोनों शहर के महत्वपूर्ण इलाके में घूम रहे थे। तभी दो लोगों ने उनके आगे मोटर साइकिल रोकी । एक व्यक्ति उतर कर आया और पूछा, “आप लोग नेता जी के घर की तरफ से आ रहे है ना ?” झूठे ने हेकड़ी में आकर कह दिया, “हाँ, आ रहे हैं। नेताजी के वहाँ तो हम अक्सर जाते रहते है।” इतना कह कर झूठे ने सच्चे की ओर देखा, ताकि वह भी उसकी ‘हाँ’ में ‘हाँ मिलाए ।

सच्चा आदत से मजबूर था । बोला, “कौन नेता जी ? में न किसी को जानता हूँ और न कभी किसी नेता के घर गया। “झूठे को बड़ा क्रोध आया । बोला, “हाँ, ये नेता जी को नहीं जानता । ये तो उपर से नहीं आ रहा है, बल्कि मुझे यहीं रास्ते में मिला ।” लड़कों ने झूठे की वाह लेने के लिए कहा, “लेकिन आज तो भाई साहब आपने कमाल कर दिया।”

“हाँ-हाँ , कमाल तो मैं हमेशा ही करता हूँ।” झूठे ने अपनी तारीफ सुन कर चौड़ा होते हुए कहा। उसी वक्त दूर से सैकड़ों लोगों की भीड़ आती हुई दिखाई दी। भीड़ करीब आई तो झूठे ने सच्चे के कान के पास फुसफुसा कर कहा, “लगता है आज तेरा सच्चाई का भूत उतर जाएगा।” तभी मोटरसाइकिल वाले लड़कों ने झूठे की ओर संकेत कर कहा, “यही है, पकड़ लो।” फिर तो पलक झपकते ही भीड़ ने झूठे को पीट-पीट कर बेहाल कर दिया। उसका एक हाथ और एक टांग भी तोड़ दी। फिर पुलिस भी आ गई और झूठे को पुलिस को सौंप दिया गया ।

हुआ यह था कि नेता जी के घर पर भीड़ लगी थी। तभी भीड़ में से किसी ने नेता जी को पत्थर मार दिया। हालांकि पत्थर किसी और को लगा, किन्तु उसका सिर फूट गया। इस घटना के तुरंत भीड़ में भगदड़ मची और तीन-चार युवक अलग-अलग दिशाओं की ओर भागे। सभी के पीछे भीड़ भी भागी।

बहरहाल, सच्चे के बयान पर ही झूठा पुलिस की गिरफ्त से छूट पाया था। लेकिन उसके होश ठिकाने लग गए थे। सच्चे ने सच्चाई की ताकत देख ली तो झूठा यह जान गया कि बेवजह झूठ बोलने से बिन बुलाए मेहमान की तरह संकट आ सकता है।

प्यारे बच्चो – हमे इस majedar kahani से यह सबक मिलता है की हमे कभी भी झूठ नहीं बोलना चाहिए क्योंकी झूठ की हमेशा हार होती है | 
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