Desi hindi story for kids // मेलजोल वाली कोठी

प्यारे बच्चो- आज हम आपके लिए desi hindi story ले कर आये हैं, दरअसल ये कहानी दो भाईयों के बिच की लड़ाई का है |इस कहानी desi hindi story से मुझे पूरी उम्मीद है ये आपको बहुत पसंद आयेगी | 

मेलजोल वाली कोठी 

जाड़े के दिन थे। कई सालों बाद टूकी अपनी दादी और मां के साथ गांव आई थी। जब टूकी तीन साल की थी, तभी उनका परिवार कारोबार के सिलसिले में दिल्ली शहर में रहने लगा। टूकी अपनी दादी से गांव के इतने किस्से सुन चुकी थी कि सुबह होते ही वह घर के आसपास घूमने निकल गई। एक छोटी-सी चाय की दुकान के सामने जब वह पहुंची, तो वहां बैठे बूढ़े दुकानदार से उसने पूछा-“बाबा, कनिया का तालाब कौन सा रास्ता जाएगा?” बूढ़े ने ध्यान से टूकी को देखा और बोला-

“सामने बाईं ओर वाला।” फिर पूछा-“अरे बिटिया, तुम मेलजोल वाली कोठी से आई हो क्या? और कौन-कौन आया है? तुम्हारी दादी आई हैं क्या? “टूकी ने थोड़ी हैरानी से कहा-“बाबा, मैं नहीं जानती कि आप किस मेलजोल वाली कोठी की बात कर रहे हैं। मैं सामने वाले घर से आई हूँ। कल रात ही हम दिल्ली से यहां पहुंचे हैं। मेरी मां और दादी भी आई हैं।”बूढ़ा दुकानदार हंसकर बोला-“तुम्हारी दादी ही तो मेरी भाभी हैं। मैं उनसे मिलने जरूर आऊंगा।”

टूकी सुबह जब गांव के आसपास के खेतों और तालाबों का चक्कर लगाकर घर पहुंची, तो धूप पूरी तरह निकल चुकी थी। घर पहुंची, तो दादी घर के बड़े से आंगन में अपनी खाट खींचकर धूप की ओर ले जा रही थीं। टूकी ने खाट खिसकाने में मदद करते हुए पूछा-“दादी, यह मेलजोल
वाली कोठी कहां है?”दादी ने हंसकर कहा-“अरे, इतनी सुबह तुम्हें कौन मिल गया था, किसने तुम्हें यह बताया?”
__-“बाहर एक बूढ़े बाबा ने और वह आपको भाभी कह रहे थे।”

“जरूर बेनी होगा!”-कहकर दादी ने लंबी सांस भरी और आंगने के बाहर बीचोबीच बनी दीवार में बने दरवाजे और सीढ़ी को देखने लगीं। टूकी ने फिर कहा-“दादी, आपने बताया नहीं। बताइए न?” “अरे छोड़ो न देखो! कितनी अच्छी धूप है। शहर के फ्लैट में टंगे-टंगे मौसम का कुछ पता ही नहीं चलता। जरा मेरी खाट उस दरवाजे तक ले चलो।”-दादी ने बात को टाला। “दादी, बात मत टालिए! मेलजोल वाली कोठी की बात बताइए न?”-टूकी ने जिद की और खाट को खींचा। दादी बोली-“टूकी आज के कंप्यूटर, टीवी और इंफोटेक के जमाने में तुम्हें इस बात का यकीन आए या नहीं। पर इसके पीछे दो भाइयों की, रूठों को मनाने की कहानी है-

एक बड़ी कोठी में दो भाई अपने पिता के साथ रहते थे। पिता के मरने के बाद उन्होंने आपस में सलाह करके कोठी में ही अलग-अलग रहने का फैसला किया। कोठी बहुत बड़ी थी और आंगन तो इतना बड़ा कि उसमें दो बैडमिंटन कोर्ट बन जाएं।
___ अलग रहने के बाद भी दोनों में मेलजोल था। दोनों भाइयों ने सोच-समझकर एक दिन गांव के मिस्त्री को बुलाया। उनका विचार था कि आंगन के बीचोबीच एक छोटी सी दीवार बनवा दी जाए। यह दोनों घरों को अलग करने का एक निशान रहेगा, जिससे भविष्य में उनके बच्चों के बीच कोठी के बंटवारे को लेकर कोई लड़ाई न हो। वह कहने को ही दीवार थी। बच्चे दिन में उस पर खेलते। दोनों भाई आते-जाते कई बार बातें
करते। दोनों भाइयों का काम अलग-अलग था,पर अपने काम के विषय में वे एक-दूसरे से सलाह जरूर लेते।

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हुआ यह कि एक बार कारोबार की किसी छोटी सी बात को लेकर दोनों भाइयों में कहासुनी हो गई। दोनों भाइयों में बोलचाल बंद हो गई। गुस्से में वे एक-दूसरे की शक्ल भी नहीं देखना चाहते थे। दोनों की पत्नियां चाहकर भी एक-दूसरे से बात नहीं कर सकती थीं। वह तो कहो कि तभी विश्वकर्मा पूजा का त्योहार आ गया। एक दिन पुराना मिस्त्री आया, जिसने आंगन के बीच की दीवार बनाई थी। वह बड़े भाई से बोला-“इन दिनों मेरे पास कोई काम नहीं है। त्योहार नजदीक है कुछ रंगाई- पुताई का काम मिल जाता, तो कुछ कमाई हो जाती। संयोग से उस दिन बड़े भाई को जरूरी काम से दिन भर के लिए गांव से बाहर जाना था।

वह कुछ देर सोचता रहा। उसने एक निगाह आंगन की छोटी दीवार पर डाली फिर बोला-“मिस्त्री काका, एक काम है। जल्दी करना होगा। अगर कर सको तो?”मिस्त्री बोला-“आप काम तो बताइए। मैं हर काम कर दूंगा।”बड़े ने कहा-“यह आंगन के बीच छोटी दीवार देख रहे हैं न! इसे
दिन भर में इतनी ऊंची कर दीजिए कि इधर उधर आने-जाने वाले का चेहरा दिखाई न दे। मैं अपने भाई का चेहरा बिल्कुल नहीं देखना चाहता। आखिर वह अपने आपको समझता क्या है?”

मिस्त्री ने कहा-“ठीक है। शाम तक आपका काम मैं कर दूंगा।” पूरा दिन मिस्त्री काम करता रहा। शाम को बड़ा भाई घर लौटा। उसे यह देखकर हैरानी हुई मिस्त्री ने दीवार को तो ऊंचा कर दिया था, पर दीवार में एक बड़ा सा दरवाजा बना दिया था। दरवाजे के दोनों ओर दो सुंदर-सुंदर सीढ़ियां बना दी थीं, ताकि इधर से उधर आसानी से आना-जाना हो सके। बड़े भाई का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उसने चिल्लाकर कहा-“यह तुमने क्या किया? मैं तुम्हें एक पैसा मजदूरी नहीं दूंगा।”

बेनी मिस्त्री ने धीरे से कहा-“आप मुझे एक पैसा न दें। मैंने इस कोठी से बहुत मजदूरी पाई है। पर एक बात जान लें कि आपस में लड़ाई एक दूसरे से दूर जाकर नहीं सुलझाई जाती। आपसी लड़ाई सुलझाने के लिए एक-दूसरे के निकट आना होता है। यह दरवाजा मैंने आप दोनों भाइयों
में आपसी मेलजोल के लिए बनाया है। मैं चाहता हूं कि आप दोनों भाइयों में प्यार बना रहे।”

इस बात को सुनकर दोनों भाइयों को अपनी-अपनी भूल पता चली। छोटे भाई ने अपनी गलती मानी। बड़े ने उसे माफ कर दिया। दोनों भाइयों ने मिलकर बेनी मिस्त्री को दुगुनी मजदूरी दी। और तभी से गांव में उस कोठी का नाम मेलजोल वाली कोठी पड़ गया। कहानी सुनाकर जैसे ही दादी चुप हुई। टुकी बोली-“दादी,यह पापा और चाचा की कहानी है न! और यह अपना घर ही मेलजोल वाली कोठी है न?”

दादी बोली-“मेरी छोटी सी बिटिया बहुत समझदार हो गई है और जो तुम्हें दुकान पर मिला था, वही बेनी मिस्त्री ही है।”टूकी ने कहा-“अब समझ में आया कि पापा और चाचा शहर में भी एक-दूसरे से पूछे बिना कोई काम क्यों नहीं करते। यह इसी मेलजोल वाली कोठी के ही कारण ही हुआ
है न दादी।” -“हां।” “पर तब मैं कहां थी दादी।”-टूकी ने पूछा। “तुम नन्ही सी मेरी गोद में थीं।”-टूकी की मां ने कहा। “पर अब तो बड़ी हो गई हूँ
और आंगन के इस दरवाजे को देखकर समझ गई हूँ कि रूठे दोस्तों को बातचीत करके मना लेना चाहिए।”

प्यारे बच्चो- ये कहानी desi hindi story आपको कैसी लगी हमे जरूर बताइयेगा ताकि हम आपके लिए इसी  तरह की desi hindi story ले कर आ सकें |

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